गैस चैंबर बनती देश की राजधानी
डॉ राकेश कुमार आर्य
प्रकाश पर्व दीपावली की चमक दमक पिछले कुछ दशकों से उत्तर भारत और विशेष रूप से दिल्ली के एनसीआर में बहुत फीकी पड़ चुकी है। इसका कारण होता है इस मौसम में यहां पर फैलने वाला पर्यावरण प्रदूषण, जिसके कारण लोगों का जीना कठिन हो जाता है। पर्यावरण की इस भयानक समस्या के चलते यह क्षेत्र गैस चैंबर की स्थिति में परिवर्तित हो जाता है। जिससे स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे कई लोगों को जीवन तक खोना पड़ जाता है। सांस रोग अथवा फेफड़े संबंधी किसी प्रकार की बीमारी वाले लोगों के साथ-साथ हृदय रोगी भी कई प्रकार की समस्याओं से जूझते हुए दिखाई देते हैं। निर्दयी राजनीति और राजनीति में उतरकर काम करने वाले लोगों के लिए कुछ दिन इस पर टीका टिप्पणी करने का समय होता है, उसके पश्चात ये स्वयं भी अपनी दुनिया में जाकर कहीं खो जाते हैं।
दीपावली के प्रकाश पर्व के अवसर पर और उसके बाद दिल्ली-एनसीआर का वायु गुणवत्ता सूचकांक अक्सर 400 से 500 के पार पहुँच जाता है, जिसे 'गंभीर' या 'आपातकालीन' श्रेणी में रखा जाता है। इतनी बुरी स्थिति में लोगों को जीने के लिए प्राणवायु कितनी शुद्ध मिलती होगी, यह सहज ही कल्पना की जा सकती है। अच्छी बात तो यह होगी कि लोगों को इस बुरी स्थिति से निकालने के लिए कुछ स्थाई सुरक्षा उपाय किये जाएं। परंतु ऐसा होता नहीं है। दिल्ली की सरकार कुछ समय के लिए उछल कूद करती हुई दिखाई देती है, उसके बाद वह भी शांत हो जाती है। जहां तक आम जनता की बात है तो वह इस गैस चैंबर में जीने के लिए अपने आप को या तो अभ्यस्त बना चुकी है या मजबूरी में किसी प्रकार जीवन यापन कर रही है। एसआईआर के भ्रामक बिंदु पर आंदोलन खड़ा करने वाले लोग अर्थात आंदोलनजीवी इस मुद्दे पर कोई सकारात्मक चिंतन प्रस्तुत कर सकें, ऐसा भी कुछ दिखाई नहीं देता।
इस संबंध में विशेषज्ञों का मत है कि हवा में तैरने वाले सूक्ष्म कण (PM 2.5) का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित सुरक्षित मानकों से 30 से 40 गुना तक अधिक दर्ज किया जाता है। ये बारीक कण सांस के जरिए सीधे फेफड़ों और रक्तप्रवाह में प्रवेश कर जाते हैं। जिससे ये सीधे ही मानव के स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। जिसके कारण अस्पतालों में भी बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ लग जाती है। विभिन्न स्वास्थ्य रिपोर्टों के अनुसार, दीपावली के बाद दिल्ली के अस्पतालों में सांस की बीमारियों, अस्थमा के दौरों, आंखों में जलन और छाती में संक्रमण के मामलों में 30% से 40% की भारी बढ़ोतरी देखी जाती है। भीड़ में होने वाली इस वृद्धि से अस्पतालों में पहले से ही दाखिल उन रोगियों के लिए विशेष समस्या खड़ी होती है जो वहां पहले से ही अपना उपचार करा रहे होते हैं।
वायु प्रदूषण की इस प्रकार की भयंकर मार से सबसे अधिक प्रभावित बच्चे और वरिष्ठ नागरिकगण होते हैं। इस भयंकर बीमारी का सबसे अधिक प्रभाव हमारी अपनी उम्र पर पड़ रहा है। लोगों की औसत उम्र निरंतर घट रही है।
वैश्विक शोध संगठनों की रिपोर्ट बताती है कि वायु प्रदूषण के इसी खतरनाक स्तर के कारण दिल्ली में रहने वाले लोगों की औसत जीवन प्रत्याशा लगभग 10 से 12 वर्ष कम हो रही है। यह स्थिति बहुत ही चिंता उत्पन्न करने वाली है । इस पर न केवल सरकार को अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए बल्कि सारी राजनीति को भी एकमत से एक मंच पर आकर ठोस निर्णय लेना चाहिए। इसे अपनी ओच्छी राजनीति का माध्यम न मानकर प्रत्येक राजनीतिक दल लोक कल्याण के महत्वपूर्ण उद्देश्य के प्रति अपने समर्पण का एक माध्यम मानना चाहिए अर्थात जनसेवा का एक सबसे अनमोल अवसर।
ऐसा भी नहीं है कि एनसीआर में फैलने वाले इस खतरनाक वायु प्रदूषण के लिए केवल दीपावली के पटाखों को कोई जिम्मेदार माना जाए, इसके लिए कुछ अन्य कारण भी जिम्मेदार हैं। दीपावली की आतिशबाजी से भारी मात्रा में सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और जहरीली धातुएं हवा में घुल जाती हैं। इस आतिशबाजी के अतिरिक्त इसी मौसम में पड़ोसी राज्यों (पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश) में धान की कटाई के बाद पराली जलाई जाती है, जिसका धुआं हवाओं के साथ दिल्ली पहुँचता है। पराली का धुंआ एनसीआर की वायु को और भी अधिक जहरीला बना देता है।
पराली की यह समस्या मानव निर्मित है। इसे मानव ने स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हुए तैयार किया है । हम सभी जानते हैं कि गांव में भी किसान लोग गाय पालन ,पशुपालन से लोग दूरी बना रहे हैं। जिसके कारण खेतों में पराली को जलाना पड़ रहा है। पहले इसको समाप्त करने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया होती थी, जिसके अंतर्गत किसान पराली को घर ले जाकर पशुओं को खिलाता था। पशुओं से गोबर की खाद तैयार होती थी और वह गोबर की खाद फिर खेत में जाकर पड़ जाती थी। इस प्रकार एक चक्र बना हुआ था। जिसे मशीनी युग में मशीनों से तैयार होने वाले दूध ने तोड़ दिया है। ट्रैक्टर ने बैल आदि को किसान के खेत से और घर से दूर कर दिया है । उसी का यह परिणाम है कि पराली को जलाना किसान की मजबूरी हो गई है। आधुनिकता के नाम पर कुत्ते पालने वाले लोगों ने पशुपालन छोड़ दिया है। विशेष रूप से वह पशु जो उसके जीवन रक्षक होते थे, किसान के जीवन से दूर चले गए हैं। इसके चलते जो अवस्था उत्पन्न हुई है वह मनुष्य के लिए प्राणभक्षक बन गई है।
इस वायु प्रदूषण से एनसीआर को बचाने के लिए सबसे बड़ा भगीरथ प्रयास तो यही करना पड़ेगा कि एनसीआर के लोगों को स्वाभाविक और शुद्ध दूध देने के लिए इतनी मात्रा में पशुपालन किया जाए कि सारी पराली उनके भोजन के काम आ जाए अर्थात उसे जलाना न पड़े।
पराली के अतिरिक्त अक्टूबर नवंबर के महीने में आने वाली ठंड की सुगबुगाहट भी प्रदूषण को बढ़ाने का एक कारण बनती है। यह एक स्वाभाविक प्राकृतिक प्रक्रिया है। जिससे बचा नहीं जा सकता। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में यह प्रदूषण एक क्रॉनिक हेल्थ क्राइसिस का रूप ले लेगा। आने वाली पीढ़ी कमजोर फेफड़ों के साथ पैदा होगी और कम उम्र में ही लोग फेफड़ों के कैंसर और दिल की बीमारियों से ग्रसित होने लगेंगे। उस स्थिति से बचने के लिए अभी से तैयारी करनी होगी। विशेष रूप से तब जबकि यह स्पष्ट हो गया है कि प्रदूषण के कारण अंतरराष्ट्रीय कंपनियां और कुशल पेशेवर दिल्ली से दूर बेंगलुरु, हैदराबाद या विदेश पलायन करने लगे हैं। लगातार स्मॉग के कारण पर्यटन उद्योग, निर्माण कार्य और व्यापार पर बुरा असर पड़ता है, जिससे देश को अरबों रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
इससे पहले की सब कुछ चौपट हो जाए समय रहते एनसीआर को गैस चैंबर से बाहर लाने की तैयारी युद्ध स्तर पर करनी होगी।
(लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
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