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हृदय के कनक-पृष्ठ पर, तुम्हारी ही छवि उभर रही

हृदय के कनक-पृष्ठ पर, तुम्हारी ही छवि उभर रही

कुमार महेंद्र
अंतस-पटल के कोरे पृष्ठ पर,
प्रीति-दीप जब जलने लगे।
सूने मन के मुरझाए वन में,
स्नेह-सुमन फिर खिलने लगे।
स्मृतियों की सुनहरी स्याही से,
प्रेम-कथा मन में सँवर रही।
हृदय के कनक-पृष्ठ पर, तुम्हारी ही छवि उभर रही।।


नयन तुम्हारे नील गगन-से,
जिनमें तारक-मालाएँ हैं।
अधरों पर मुस्कान तुम्हारी,
जैसे मंद-मंद तरंगें गाएँ।
मन-मंदिर के पावन दीपों में,
तुम्हारी ज्योति प्रखर रही।
हृदय के कनक-पृष्ठ पर, तुम्हारी ही छवि उभर रही।।


काल-सरिता के शांत तटों पर,
जब अतीत निहारता हूँ।
तुम्हारी मृदुल स्मृतियों का ही,
मौन सहारा पाता हूँ।
जीवन-ग्रंथ के हर पृष्ठ पर,
तुम्हारी छवि उतर रही।
हृदय के कनक-पृष्ठ पर, तुम्हारी ही छवि उभर रही।।


शशि की धवल सुधा हो तुम,
या उषा की प्रथम किरण।
तुमसे महके मन की वीणा,
तुमसे पावन हर स्पंदन।
अनुरागों की मनहर रागिनी में,
तुम्हारी तान मुखर रही।
हृदय के कनक-पृष्ठ पर, तुम्हारी ही छवि उभर रही।।


प्रेम अजर है, प्रेम अमर है,
प्रेम स्वयं प्रभु का स्वर है।
जिस उर में निष्कलुष अनुराग,
वहीं प्रेम ही परमेश्वर है।
जीवन के हर सुवर्ण पन्ने पर,
तुम्हारी प्रीति निखर रही।
हृदय के कनक-पृष्ठ पर, तुम्हारी ही छवि उभर रही।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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