राष्ट्रसमर्पण

राष्ट्रसमर्पण

अरुण दिव्यांश
तेरा तन अर्पण तेरा मन अर्पण ,
तुम्हीं तो हो राष्ट्र के रखवाले ।
हे पावन वर्दीधारी राष्ट्र प्रहरी ,
हार्दिक नमन कानून रखवाले ।।
तेरे रोम रोम में दिखता राम है ,
तन को मिलता कब आराम है ।
हनुमत भूमिका निभाते हो सदा ,
तेरा आराम तुझको हराम है ।।
तुम्हीं से राष्ट्र नर्क यह बनता ,
तुम्हीं से राष्ट्र बनता यह स्वर्ग ।
तुम्हारी सेवा यह अपसर्ग है ,
तुम्हीं से होता यह है उत्सर्ग ।।
राष्ट्र की हॅंसी है तुम्हारी हॅंसी ,
राष्ट्र का गम ही ही तेरा गम ।
सज्जनों संग उतना नम होते ,
सज्जन होते जितने हैं नम ।।
शब्दार्थ : अपसर्ग = त्याग , उत्कर्ष = न्याय
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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