लघुकथा का मर्म है “लघुता में प्रभुता”: डा अनिल सुलभ

- लेख्य मंजूषा द्वारा साहित्य सम्मेलन में आयोजित हुई गद्य-गोष्ठी, स्मरण किए गए पुष्करणा और कल्याणी कुसुम सिंह
पटना, २५ अक्टूबर । लघुकथा का मर्म है, लघुता में प्रभुताई! कम शब्दों में बड़ी बात कहना ही, लघुकथा का उद्देश्य है। बड़ी बात कहने के लिए लेखक को बड़ा होना पड़ता है। “राम चरित मानस” लिखने के लिए तुलसीदास होना पड़ता है।
यह बातें रविवार को साहित्यिक संस्था लेख्य मंजूषा के तत्वावधान में साहित्य सम्मेलन में आयोजित गद्य-गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। डा सतीश राज पुष्करणा की ८० वीं जयंती और डा कल्याणी कुसुम सिंह की स्मृति को समर्पित इस गोष्ठी में उन्होंने कहा कि लघुकथा-आंदोलन ने डा पुष्करणा को अमर कर दिया। कल्याणी जी एक गंभीर और चिंतनशीला संवेदना संपन्न लेखिका थीं!
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ किशोर सिन्हा, डॉ अनीता राकेश, शुभ चंद्र सिन्हा तथा डॉ सुनील कुमार उपाध्याय ने अपने-अपने विचार रखें तथा दोनों साहित्यिक विभूतियों को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया।

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