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अनोखा पुरस्कार

अनोखा पुरस्कार

जय प्रकाश कुवंर
जन्मदाता माता पिता के झोली में,
आज कल है ऐसा पुरस्कार आया।
जिसको जन्मते गोद में सुलाया,
अपने पैरों चलने न दे, कंधे पर घुमाया।
अपने हाथों रोटी तोड़ कर खिलाया,
थोड़ा होश होने पर स्कूल में पढ़ाया।
शादी, नौकरी, बेटा, बेटी उनका,
खुब एक सुखमय संसार बनाया।
अब वे बीबी के गुलाम कुछ इस कदर हुए,
बीबी के हर बात में हां में हां मिलाया।
अंत समय जब माँ बाप बुढ़े हुए,
तो औलाद के नजर में बोझ कहलाया।
इतने से भी औलाद का मन नहीं भरा,
तो बिलखते माँ बाप को बृद्धाश्रम छोड़ आया।

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