आज चंद्र-स्पर्श को आतुर है ज्योत्स्ना

आज चंद्र-स्पर्श को आतुर है ज्योत्स्ना

कुमार महेंद्र
अंबर की नीलिमा में,
जागी मिलन की प्यास।
श्वासों में घुलने लगा,
प्रणय-पर्व का उल्लास।
चंचल तरंगों-सी कौमुदी,
रच रही मिलन की कल्पना।
आज चंद्र-स्पर्श को आतुर है ज्योत्स्ना।।


नभ से उतर रही है,
रजनी की चंद्रिका।
तारों के मोतियों से,
सजती निशा-नायिका।
प्रकृति के कण-कण में,
जागी प्रिय स्पर्श की भावना।
आज चंद्र-स्पर्श को आतुर है ज्योत्स्ना।।


मलयज पवन की
सरसराहट भी मौन है।
इस प्रेम-पर्व में
व्याकुल भला न कौन है?
चाँदनी की छुअन से,
महकी हृदय-कामना।
आज चंद्र-स्पर्श को आतुर है ज्योत्स्ना।।


चाँदनी समा रही,
प्रियतम के अंक में।
जैसे कोई कली खिले,
एकांत के निकुंज में।
दोनों रच रहे आज,
प्रणय की नव वंदना।
आज चंद्र-स्पर्श को आतुर है ज्योत्स्ना।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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