आज चंद्र-स्पर्श को आतुर है ज्योत्स्ना
कुमार महेंद्रअंबर की नीलिमा में,
जागी मिलन की प्यास।
श्वासों में घुलने लगा,
प्रणय-पर्व का उल्लास।
चंचल तरंगों-सी कौमुदी,
रच रही मिलन की कल्पना।
आज चंद्र-स्पर्श को आतुर है ज्योत्स्ना।।
नभ से उतर रही है,
रजनी की चंद्रिका।
तारों के मोतियों से,
सजती निशा-नायिका।
प्रकृति के कण-कण में,
जागी प्रिय स्पर्श की भावना।
आज चंद्र-स्पर्श को आतुर है ज्योत्स्ना।।
मलयज पवन की
सरसराहट भी मौन है।
इस प्रेम-पर्व में
व्याकुल भला न कौन है?
चाँदनी की छुअन से,
महकी हृदय-कामना।
आज चंद्र-स्पर्श को आतुर है ज्योत्स्ना।।
चाँदनी समा रही,
प्रियतम के अंक में।
जैसे कोई कली खिले,
एकांत के निकुंज में।
दोनों रच रहे आज,
प्रणय की नव वंदना।
आज चंद्र-स्पर्श को आतुर है ज्योत्स्ना।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8
0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews