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तुम्हारे कुंवारे नयन, प्रणय-सुधा के पारावार

तुम्हारे कुंवारे नयन, प्रणय-सुधा के पारावार

कुमार महेंद्र
अंतरमन की विमल ज्योति,
प्रीत-पंथ की भव्य लगन।
मृदुल अनुरागी दृष्टि से,
पुलकित हो उठता तन-मन।
मोहक छवि की शीतल आभा,
हर ले मन का सारा विकार।
तुम्हारे कुंवारे नयन, प्रणय-सुधा के पारावार।।


लोक-व्यवहारों के बीच पली,
मन में प्रणय की उठी तरंग।
परिवार, समाज, संबंधों में,
मर्यादा संग प्रीत के रंग।
निष्कलुष भावों की सरिता,
बहती जैसे निर्मल धार।
तुम्हारे कुंवारे नयन, प्रणय-सुधा के पारावार।।


दृष्टि जहाँ तक जाती मेरी,
दिखता तुममें रूप अनूप।
राग-रंग और प्रेम-भाव में,
झलके मनभावन स्वरूप।
निशि-दिन मन के आँगन में,
खिलता अनुरागों का संसार।
तुम्हारे कुंवारे नयन, प्रणय-सुधा के पारावार।।


अंतर में उठती मृदु लहरियाँ,
मिलन-विरह का सरस प्रवाह।
एक झलक से पुलकित मन में,
फिर जाग उठती प्रेमिल चाह।
तुमसे महक उठे जीवन जैसे,
वसंत लुटाए मधुमय बहार।
तुम्हारे कुंवारे नयन, प्रणय-सुधा के पारावार।।


नयनों की यह मौन भाषा,
शब्दों से भी अधिक मुखर।
बिन कहे जो कह जाते हैं,
मन तक पहुँचाते भाव-स्वर।
इनमें डूबा मन यह चाहे,
मिल जाए प्रीत का मधुर द्वार।
तुम्हारे कुंवारे नयन, प्रणय-सुधा के पारावार।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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