गांधी दर्शन के अमृत का, आओ मिलकर करें रसपान
कुमार महेंद्रखादी की चादर ओढ़े,
स्वावलंबन की परिभाषा।
चरखे के हर एक फेरे में,
जाग उठी नव आशा।
त्याग और तप की मूरत थे,
बापू भारत के वीर महान।
गांधी दर्शन के अमृत का, आओ मिलकर करें रसपान।।
सत्याग्रह का शस्त्र उठाकर,
जिसने बदली देश की तस्वीर।
बिना तोप और बिना लहू के,
तोड़ी दासता की ज़ंजीर।
अन्त्योदय का स्वप्न था जिनका,
हर निर्धन का हो उत्थान।
गांधी दर्शन के अमृत का, आओ मिलकर करें रसपान।।
भेदभाव की दीवारों को,
मिलकर हमको ढहाना है।
छुआछूत और द्वेष मिटाकर,
जग में प्रेम बढ़ाना है।
सर्वधर्म-समभाव का,
हम सदा करें आह्वान।
गांधी दर्शन के अमृत का, आओ मिलकर करें रसपान।।
स्वच्छ रहे परिवेश हमारा,
स्वच्छ रहें मन के विचार।
सत्य मार्ग पर चलकर ही तो,
महकेगा सारा संसार।
सत्य-अहिंसा के पथ पर चलकर,
श्रेष्ठ बने हर इंसान।
गांधी दर्शन के अमृत का, आओ मिलकर करें रसपान।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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