प्रधानमंत्री का विकसित भारत बनाने का संकल्प
डॉ राकेश कुमार आर्य
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। 7 अक्टूबर 2001 को उन्होंने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की थी। तब से अब तक उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा है। वह निरंतर या तो प्रदेश में या फिर देश में राजनीति के केंद्र में रहे हैं। उनका एक ही संकल्प है कि 2047 तक विकसित भारत बनाया जाए। उनका सपना है कि जब भारत 2047 में अपनी स्वाधीनता का शताब्दी समारोह आयोजित कर रहा हो तो उस समय वह विकसित, समृद्ध और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में खड़ा हो। इसके अतिरिक्त वैश्विक नेतृत्व उसके हाथों में हो और बौद्धिक क्षेत्र में विशेष रूप से भारत सभी के लिए आदर्श बन चुका हो। उनका यह रोड मैप है, और इसी पर वह पूरे देश को चलाना चाहते हैं। उनकी नीति, रणनीति और कार्यनीति में केवल एक ही संकल्प दिखाई देता है कि ' हम करके रहेंगे ' और हम एक दिन कामयाब अवश्य होंगे'। उनका आत्मविश्वास बोलता है कि बड़े लक्ष्य को पाने के लिए आराम की मुद्रा में नहीं आना है। निश्चित रूप से इस लक्ष्य को पाने के लिए हमारे सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है। अब देखना यह है कि प्रधानमंत्री सारे राष्ट्र को इस लक्ष्य की प्राप्ति हेत सामूहिक प्रयास करने के लिए कितना जागरुक कर पाएंगे ? विशेष रूप से तब जब लोगों के भीतर भ्रष्टाचार आज भी जड़ जमाये बैठा हो। हमारा मानना है कि सामूहिक प्रयासों में मानव की भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति सबसे बड़ी बाधा होती है। इसके बाद विचारधारा के टकराव की स्थिति भी आती है। जो लोगों को सामूहिक प्रयास करने से रोकती है। देश के सभी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल इस प्रकार के सामूहिक प्रयासों में बड़ी बाधा बन सकते हैं।
इसके उपरांत भी प्रधानमंत्री का आत्मविश्वास बोलता है कि ' हर चीज में भारत सिरमौर है । टेक्नोलॉजी खेल, उद्योग में भारत का तिरंगा लहराये । आज पूरे विश्व में भारत के पायलट की चर्चा है। एक दिन वह भी आएगा जब दुनिया मेड इन इंडिया प्लेन की चर्चा करेगी । यह लक्ष्य तभी पूरे होंगे जब हम दूरदर्शी नीतियां बनाएंगे और परिश्रम की पराकाष्ठा करें । उनका मानना है कि अब यह समय आराम का नहीं है। यह समय सोच के साथ आगे बढ़ने का है। देश के लिए खुद को खपा देने का है। आज भारत में जितने युवा हैं , वह इतिहास से मिला बहुत बड़ा मौका है जिसे हमें खोना नहीं है।'
विकसित भारत बनाने की प्रधानमंत्री मोदी की योजना केवल एक सरकारी योजना नहीं है, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के सामूहिक पुरुषार्थ, राष्ट्रीय गौरव और आधुनिकता की ओर बढ़ने का एक महा-संकल्प है। इस संकल्प का मुख्य उद्देश्य देश के हर नागरिक के जीवन स्तर को ऊपर उठाना, आर्थिक असमानता को समाप्त करना और भारत को वैश्विक पटल पर एक महाशक्ति के रूप में स्थापित करना है। इसके लिए एक पवित्र सोच विकसित करनी होगी । इसके संबंध में प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कि ' हमने इस राष्ट्र में जन्म लिया है। यह एहसास ही अमृत है। इसके सामने सत्ता सुख कुछ नहीं है। पद प्रतिष्ठा तो कहीं भी मिल सकता है। लेकिन भारत जैसी पुण्य भूमि नहीं मिलेगी। 25 वर्षों का आकलन इससे नहीं होगा कि मैं कहां पहुंचा बल्कि इससे होगा कि मेरा देश कहां पहुंचा ? प्रधानमंत्री का यह भी कहना है कि जीवन का एक ही ध्येय हो ,देश के लिए निस्वार्थ कर्म ।मेरे लिए कर्म ही सब कुछ है ।।कर्म ही मेरा धर्म है। गीता ने हमें सिखाया है कि कर्मण्येवाधिकारस्ते - मैं कर्म को अपना धर्म मानता हूं और मैं कर्म पूरी क्षमता से करता रहूं।"
अपने इस महा संकल्प को धरती पर उतारने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने चार प्रमुख स्तंभों पर ध्यान केंद्रित किया है, जिन्हें पीएम मोदी ने देश की सबसे बड़ी जातियां बताया है। इन स्तंभों में प्रथम स्तंभ है युवा । प्रधानमंत्री मोदी की सोच है कि 2047 से पहले युवाओं को आधुनिक शिक्षा, कौशल विकास और नवाचार के माध्यम से भविष्य के लिए तैयार किया जाए। निश्चित रूप से इसके लिए महान परिश्रम की आवश्यकता है। हमारा मानना है कि इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए देश के शिक्षा संस्कारों में भी व्यापक परिवर्तन करने की आवश्यकता है। जब तक देश के विद्यालयों का पाठ्यक्रम देशभक्ति से भरा हुआ नहीं होगा और हमारी भारतीय मनीषा उसका नेतृत्व नहीं कर रही होगी तब तक इस लक्ष्य को प्राप्त करने में कठिनाइयां आती रहेंगी।
प्रधानमंत्री अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए महिला शक्ति पर भी विशेष भरोसा करते हैं। इसके लिए उनकी सोच है कि महिला नेतृत्व वाले विकास को बढ़ावा दिया जाए और महिलाओं को प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने पर काम किया जाए।
इसी प्रकार प्रधानमंत्री मोदी जी का मानना है कि कृषि का आधुनिकीकरण किया जाए। तकनीकी का उपयोग बढ़ाया जाए और किसानों की आय में वृद्धि सुनिश्चित की जाए। इसलिए वह तीसरे प्रमुख स्तंभ के रूप में किसान को ही रखते हैं। निर्धनता को मिटाने की ओर भी प्रधानमंत्री ध्यान दे रहे हैं इसलिए वह गरीब को भी अपने एक चौथे स्तंभ के रूप में मान्यता देते हैं। बुनियादी सुविधाएं जैसे पक्का मकान, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और राशन पहुंचाकर गरीबी को पूरी तरह समाप्त करने को विकसित भारत बनाने के लिए आवश्यक समझते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में इस समय देश में भारत को 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य के साथ, बुनियादी ढांचे का अभूतपूर्व विकास किया जा रहा है। 'पीएम गतिशक्ति' मास्टर प्लान के तहत राजमार्गों, रेलवे, हवाई अड्डों और बंदरगाहों का आधुनिकीकरण हो रहा है। प्रतिदिन राजमार्गों का या सड़कों का आधुनिकतम तकनीक के माध्यम से निर्माण हो रहा है। इसके साथ ही, डिजिटल इंडिया अभियान के कारण भारत आज वैश्विक स्तर पर डिजिटल भुगतान और तकनीकी समाधानों में सबसे आगे है। मेक इन इंडिया और पीएलआई योजनाओं के जरिए देश को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाया जा रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी के इस संकल्प की पूर्ति के लिए सारे देश को एक साथ उठ खड़ा होना होगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि चाहे वह सामरिक क्षेत्र हो चाहे अन्य कोई क्षेत्र हो हम किसी भी क्षेत्र में दूसरों पर निर्भर नहीं रहेंगे। यद्यपि इससे भी बड़ी चुनौती है कि हम अपनी राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बनाए रखेंगे। हम देश के भीतर उठ रहे जातिवाद, संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद, प्रांतवाद, भाषावाद को मिटा कर रहेंगे। हम अपने सांस्कृतिक मूल्यों में किसी प्रकार का क्षरण नहीं होने देंगे और अपने भारत की दिव्यता को भंग नहीं होने देंगे। हम यह भी प्रयास करेंगे कि हमारा मानसिक उत्थान हो उसमें पतन की कोई संभावना दूर-दूर तक भी दिखाई न दे। इसके लिए हम दलीय मानसिकता से ऊपर उठेंगे।
प्रधानमंत्री मोदी के आलोचकों के दृष्टिकोण से देखा जाए तो माना जा सकता है कि 2047 के विकसित भारत बनाने के अपने संकल्प के माध्यम से प्रधानमंत्री इसमें कोई राजनीति कर रहे हों ? परंतु हमारा मानना है कि यदि प्रधानमंत्री विकसित भारत बनाने के संकल्प में किसी प्रकार की राजनीति कर रहे हैं तो प्रधानमंत्री के आलोचकों को राजनीति के स्थान पर राष्ट्रनीति करने से किसने रोका है ? वह स्वयं भी इस चुनौती को भारत के नागरिकों के साथ मिलकर परास्त करने का प्रयास करें और राजनीतिक दलीय भावना से ऊपर उठकर काम करके दिखाएं ।।केवल आलोचना से काम नहीं चलेगा, प्रधानमंत्री के कार्यों की रेखा से बड़ी रेखा खींचने का काम विपक्ष को करना होगा। लोकतंत्र में देश किसी की बपौती नहीं होता है, यह उसी का होता है जो कुछ करके दिखाता है और करके दिखाने के लिए किसी पर किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है। शर्त केवल एक है कि जो कुछ किया जाए वह सकारात्मक दिशा में किया जाए, सकारात्मक सोच के साथ किया जाए और सकारात्मक ऊर्जा के निरंतर प्रवाह के लिए किया जाए।
(लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
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