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तुम्हारे अधर-कपोलों की लाली, हृदयांगन भरे उजास

तुम्हारे अधर-कपोलों की लाली, हृदयांगन भरे उजास

कुमार महेंद्र
मस्त मलंग से हाव-भाव,
मृगनयनी मनहर चाल।
मोहक कोमल कपोलों पर,
मादकता की मधुर मिसाल।
रग-रग में सौंदर्य खिला,
अंग-अंग छाया मधुमास।
तुम्हारे अधर-कपोलों की लाली, हृदयांगन भरे उजास।।


हिय में प्रिय की मृदुल स्मृति,
जीवन में अनुराग भरा।
नयनों के अंतर नेह-निर्झर,
तन-मन पर लावण्य झरा।
चाल-ढाल अति मनमोहक,
हर कदम मिलन की आस।
तुम्हारे अधर-कपोलों की लाली, हृदयांगन भरे उजास।।


स्नेहिल सौम्य आभा बिखरी,
तरुणाई का अल्हड़ उभार।
नयन मिले तो रति मुस्काए,
मन में जागे प्रीत-बहार।
भाव-भंगिमा मौन निमंत्रण,
अधरों पर खिली मुस्कान खास।
तुम्हारे अधर-कपोलों की लाली, हृदयांगन भरे उजास।।


प्रीति-जन्य उर की अठखेलियाँ,
मिलन बने अनकही पहेली।
शब्द जहाँ सब मौन हो जाएँ,
भावों की भाषा हो अलबेली।
अविरल यौवन-रस बरसे,
हिय में उठे प्रणय-उल्लास।
तुम्हारे अधर-कपोलों की लाली, हृदयांगन भरे उजास।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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