Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

प्रणय पथ पर मुझे, बस तुम मिलो

प्रणय पथ पर मुझे, बस तुम मिलो

कुमार महेंद्र
भटकूँ न इस जहान में,
तुम मेरा भाल बनो।
मेरी अधूरी धड़कनों की,
तुम मधुर सुर-ताल बनो।
चाहे दुर्गम हो पथ कितना,
बाधाओं में साहस बन ढलो।
प्रणय पथ पर मुझे, बस तुम मिलो।।


संसार के इस कोलाहल में,
तुम मौन की सौम्य पुकार हो।
मेरी विरह-विह्वल रजनी की,
तुम नव प्रभात की बहार हो।
सपनों के विस्तृत आकाश में,
शीतल चंद्रिका बन चलो।
प्रणय पथ पर मुझे, बस तुम मिलो।।


चाहत के इस अथाह सिंधु की,
तुम निर्मल-सी तट-रेखा हो।
डगमग करती जीवन-नैया की,
तुम दृढ़ आश्रय-शिला हो।
मेरे मन-उपवन में सदा,
नव आशा-किरण बन खिलो।
प्रणय पथ पर मुझे, बस तुम मिलो।।


ऋतुएँ बदलती जाएँगी,
मौसम भी रंग बदलेंगे।
पर हम दोनों साथ-साथ,
हर पथ पर आगे बढ़ेंगे।
सुख-दुख के हर मोड़ पर तुम,
स्नेह-सुधा की धारा बन बहो।
प्रणय पथ पर मुझे, बस तुम मिलो।।


पूरी जीवन-यात्रा कट जाएगी,
बस एक तुम्हारे साथ से।
महक उठेगा जीवन सारा,
प्रेमिल दिव्य अहसास से।
चाहत की कोमल कलियों में,
प्रेम-प्रसून बन सदा पलो।
प्रणय पथ पर मुझे, बस तुम मिलो।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ