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पत्नी सृष्टि का अनमोल उपहार

पत्नी सृष्टि का अनमोल उपहार

कुमार महेंद्र
जीवन के सूने आँगन में,
जो बनकर आई भोर।
जिसके आने से महक उठा,
मन का कोना-कोर।
सुख-दुख के हर एक मौसम में,
जिसका साथ मिले हर बार।
पत्नी सृष्टि का अनमोल उपहार।।


वह घर को मंदिर बनाती,
अपने पावन अहसास से।
हर मुश्किल आसान हो जाती,
उसकी मीठी आस से।
त्याग, समर्पण, करुणा का,
वह अनुपम रूप साकार।
पत्नी सृष्टि का अनमोल उपहार।।


ममता का बहता सागर,
वह प्रीत की निर्मल धारा।
इस तपते जीवन-मरुस्थल में,
वह शीत सान्निध्य हमारा।
उसके होने से ही खिलता,
गृहस्थी का सुख-संसार।
पत्नी सृष्टि का अनमोल उपहार।।


दुख की आँधी थम जाती है,
जब मिलता उसका दुलार।
सूनेपन में रंग भर देती,
उसका स्नेहिल प्यार।
उसके होने से महक रहा,
जीवन का हर एक द्वार।
पत्नी सृष्टि का अनमोल उपहार।।


कभी सहारा, कभी संबल,
कभी अटूट विश्वास।
उसकी स्नेह-सुधा से जीवन,
भर जाता उल्लास।
साथ रहे तो जीवन-पथ पर,
बिखरें प्रेम-सुमन हजार।
पत्नी सृष्टि का अनमोल उपहार।।


जीवन-यात्रा की सहचर बन,
हर पल देती साथ।
धूप मिले या छाँव मिले,
नहीं छोड़ती हाथ।
उसके प्रणय-प्रसून से महका,
जीवन का हर त्योहार।
पत्नी सृष्टि का अनमोल उपहार।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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