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तुम प्रणय की पावन प्रस्तावना हो

तुम प्रणय की पावन प्रस्तावना हो

कुमार महेंद्र
शरद-निशा की प्रथम चाँदनी,
कोमल मन की मधुर सुवास।
इस नीरस जीवन-मरुस्थल में,
तुम बनकर आए मधुमास।
शब्दों के नव संकोचों में,
उर की पहली भावना हो।
तुम प्रणय की पावन प्रस्तावना हो।।


इस सूने हृदय-देवालय में,
तुम ही प्रथम प्रवेश-द्वार।
भोर-वेला की शुभ अरुणिमा,
साँझ का अनुपम श्रृंगार।
अंतस की सुप्त चेतना में,
सहज समर्पण-आराधना हो।
तुम प्रणय की पावन प्रस्तावना हो।।


जब-जब ये चंचल नयन झुके,
तब-तब तुमने मौन कहा।
तुम ही मेरी आदि-कथा हो,
जिसका हर पृष्ठ अमोल रहा।
साँसों की मधुमय वीणा पर,
धड़कनों की चिर-साधना हो।
तुम प्रणय की पावन प्रस्तावना हो।।


तुम स्वप्नों की प्रथम रश्मि हो,
मन-प्रांगण का मधुर विहान।
तुमसे ही महके भावों का वन,
तुमसे ही प्रीत का आह्वान।
मेरे समस्त अस्तित्व में,
प्रेममयी तुम उपासना हो।
तुम प्रणय की पावन प्रस्तावना हो।।


इस जीवन के प्रत्येक क्षण में,
तुम ही मेरा संसार रहो।
यह अंत नहीं, नव आरंभ है,
हर प्रभात का आधार रहो।
इस प्रेम-ग्रंथ के हर अध्याय में,
बस अनुराग की वंदना हो।
तुम प्रणय की पावन प्रस्तावना हो।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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