
सरकारी विद्यालयों में “आशीर्वाद का दीया” जलाने के आदेश पर उठे सवाल
- सरकारी स्कूलों में इस प्रकार का आदेश जारी करना अनुचित और संवैधानिक भावना के विपरीत : रमेश कुमार
पटना। बिहार शिक्षा परियोजना परिषद, पटना के अंतर्गत प्रखंड संसाधन केंद्र, दानापुर की ओर से जारी एक कार्यालय आदेश को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक सवाल उठने लगे हैं। आदेश में 17 सितंबर 2026 को शाम 6 बजे से 7 बजे के बीच दानापुर प्रखंड के विभिन्न सरकारी विद्यालयों में “आशीर्वाद का दीया” कार्यक्रम के तहत दीप प्रज्वलित करने का निर्देश दिया गया है। आदेश में प्राथमिक विद्यालयों के लिए न्यूनतम 25, मध्य विद्यालयों के लिए 40, नए उच्च माध्यमिक विद्यालयों के लिए 50, पुराने उच्च माध्यमिक विद्यालयों के लिए 100 तथा केजीबीवी विद्यालयों के लिए 100 से 150 दीप जलाने की संख्या भी निर्धारित की गई है।
इस आदेश को लेकर भारतीय जन क्रांति दल डेमोक्रेटिक के राष्ट्रीय प्रवक्ता रमेश कुमार ने कड़ा विरोध जताया है। उन्होंने कहा कि सरकारी विद्यालय शिक्षा के केंद्र हैं और वहां किसी भी प्रकार के धार्मिक अथवा राजनीतिक प्रकृति के कार्यक्रम को विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं विद्यालय प्रशासन पर आदेश के रूप में लागू करने से पहले उसके संवैधानिक और वैधानिक आधार को स्पष्ट किया जाना चाहिए।
रमेश कुमार ने कहा, “सरकारी विद्यालयों में इस प्रकार का आदेश जारी करना बिल्कुल अनुचित है और प्रथम दृष्टया संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना तथा नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े प्रावधानों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य क्या है और सरकारी विद्यालयों में इसे अनिवार्य रूप से लागू करने का कानूनी आधार क्या है।”
विद्यालयों में अनिवार्यता पर सवाल
जारी आदेश में विद्यालयों के प्रधानाध्यापक/प्रधान शिक्षक/प्रभारी प्रधानाध्यापक, शिक्षक एवं शिक्षिकाओं तथा केजीबीवी के कर्मियों और बच्चों की भागीदारी सुनिश्चित करने के साथ स्थानीय लोगों की भागीदारी का भी उल्लेख है। आदेश में कार्यक्रम के नोटेक्स का फोटो और वीडियो उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया गया है।
रमेश कुमार ने कहा कि यदि किसी सांस्कृतिक या सामाजिक कार्यक्रम में नागरिक स्वेच्छा से भाग लेना चाहते हैं तो वह अलग विषय है, लेकिन सरकारी आदेश के माध्यम से विद्यालय के शिक्षकों और विद्यार्थियों की भागीदारी सुनिश्चित करना गंभीर प्रशासनिक एवं संवैधानिक प्रश्न पैदा करता है।
उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। वहीं शिक्षा मंत्रालय द्वारा प्रकाशित संविधान के अनुच्छेद 28 के अनुसार राज्य द्वारा पूर्णतः वित्तपोषित शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा दिए जाने पर संवैधानिक प्रतिबंध है और राज्य से सहायता प्राप्त/मान्यता प्राप्त संस्थानों में किसी व्यक्ति को धार्मिक निर्देश या धार्मिक उपासना में भाग लेने के लिए बाध्य करने के संबंध में भी विशेष संवैधानिक संरक्षण है।
“सरकारी स्कूल किसी एक विचारधारा के मंच नहीं हो सकते”
रमेश कुमार ने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य है और सरकारी संस्थानों को सभी नागरिकों के प्रति समान व्यवहार की संवैधानिक भावना के अनुरूप कार्य करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट भी संविधान को देश की सर्वोच्च कानूनी प्राधिकारिता बताते हुए भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में रेखांकित करती है।
उन्होंने कहा, “विद्यालय में शिक्षा, अनुशासन, राष्ट्र निर्माण, वैज्ञानिक सोच, संविधान और नागरिक कर्तव्यों से जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन समझ में आता है, लेकिन किसी विशेष प्रतीक या धार्मिक प्रकृति के कार्यक्रम में सरकारी कर्मचारियों और बच्चों की अनिवार्य भागीदारी सुनिश्चित करना उचित नहीं माना जा सकता।”
आदेश वापस लेने की मांग
रमेश कुमार ने बिहार सरकार और शिक्षा विभाग से मांग की कि पूरे मामले की समीक्षा की जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि संबंधित आदेश किस प्रशासनिक एवं कानूनी प्रावधान के तहत जारी किया गया है। उन्होंने कहा कि यदि कार्यक्रम पूरी तरह स्वैच्छिक है तो आदेश की भाषा में इसकी स्पष्ट घोषणा होनी चाहिए तथा किसी शिक्षक, कर्मचारी, विद्यार्थी या अभिभावक पर भाग लेने का दबाव नहीं होना चाहिए।
उन्होंने यह भी मांग की कि विद्यालयों को राजनीतिक प्रचार या किसी राजनीतिक व्यक्तित्व के महिमामंडन का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। सरकारी विद्यालयों में होने वाले कार्यक्रमों की प्रकृति ऐसी होनी चाहिए जो सभी विद्यार्थियों और नागरिकों के लिए समान रूप से स्वीकार्य हो।
हालांकि, बिहार सरकार की आधिकारिक सूचना के अनुसार “आशीर्वाद का दीया” कार्यक्रम 17 सितंबर को राज्य के जिलों, अनुमंडलों, प्रखंडों, पंचायतों और बूथ स्तर तक दीपोत्सव के रूप में आयोजित किए जाने की योजना का हिस्सा है।
रमेश कुमार ने कहा कि उनकी आपत्ति किसी व्यक्ति विशेष के प्रति नहीं, बल्कि सरकारी संस्थानों के संचालन में संवैधानिक मर्यादा और नागरिकों की स्वतंत्रता को लेकर है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि आदेश की तत्काल समीक्षा कर आवश्यक संशोधन किया जाए और विद्यालयों में किसी भी कार्यक्रम में विद्यार्थियों तथा शिक्षकों की भागीदारी को उनकी संवैधानिक स्वतंत्रता के अनुरूप रखा जाए।
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