वंदे मातरम्-राष्ट्र चेतना का स्वर
कुमार महेंद्रवंदे मातरम् गीत नहीं,
भारत की गौरव-गाथा है।
इसका हर एक शब्द-मंत्र,
सोया भाग्य जगाता है।
सदियों की निद्रा में सोई,
चेतना को करता मुखर।
वंदे मातरम्—राष्ट्र चेतना का स्वर।।
आन यही है, बान यही है,
यही देश की शान है।
इस मिट्टी की अमर सुरभि,
हर सच्चे भारतीय की जान है।
ऋषि बंकिम की यह लेखनी,
सदैव कालजयी, अजर-अमर।
वंदे मातरम्—राष्ट्र चेतना का स्वर।।
जनमानस के मुखारविंद से,
प्रस्फुटित हुआ यह दिव्य गान।
इसके ही जयघोषों से हुआ,
स्वतंत्रता का भव्य वितान।
कोटि-कोटि कंठों की भाषा,
शस्य-श्यामला छवि मनहर।
वंदे मातरम्—राष्ट्र चेतना का स्वर।।
इसके सुर में बँधा हुआ है,
इस धरा का कण-कण।
यह केवल सुर का संगम नहीं,
यह राष्ट्र-भक्ति का पावन प्रण।
युग-युग से गूँज रहा नभ में,
भारत का उद्घोष प्रखर।
वंदे मातरम्—राष्ट्र चेतना का स्वर।।
शीश झुकाकर नमन करें हम,
इस गौरवशाली गीत को।
आओ मिलकर अक्षुण्ण रखें हम,
सनातन संस्कृति की रीत को।
वंदे मातरम् सदा गूँजता रहे,
जब तक रहे धरा और अंबर।
वंदे मातरम्—राष्ट्र चेतना का स्वर।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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