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शब्द भी शर्माएं, तुम्हारी सौंदर्य-स्तुति में

शब्द भी शर्माएं, तुम्हारी सौंदर्य-स्तुति में

कुमार महेंद्र
तुम रूप की वह,
बहती सरिता हो।
या मेरे सृजन की,
कोई पावन कविता हो?
मौन खड़ी रह जाती,
यह लेखनी तेरी प्रशस्ति में।
शब्द भी शर्माएं, तुम्हारी सौंदर्य-स्तुति में।।


ये जो बिखरे हैं,
कपोलों पर केश स्याह।
इन्हें देख चाँद भी भरता,
शीतल-सी आह।
अधरों पर खिलती मुस्कान,
घोल रही मधुरिमा प्रीति में।
शब्द भी शर्माएं, तुम्हारी सौंदर्य-स्तुति में।।


तुम्हारी पायल की छम-छम में,
झंकृत मधुर राग है।
जिसे सुन धड़क उठे,
मन का सोया अनुराग है।
माथे की बिंदिया दमके,
ज्यों भोर दमके अरुणिम ज्योति में।
शब्द भी शर्माएं, तुम्हारी सौंदर्य-स्तुति में।।


चंचल चितवन जैसे,
सावन की पहली फुहार।
तुम्हें निहारना ही बन गया,
जीवन का श्रृंगार।
तुम वो मधुरिम गीत हो,
जो गूँजे मेरी हर अनुभूति में।
शब्द भी शर्माएं, तुम्हारी सौंदर्य-स्तुति में।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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