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प्रेम में मिले दर्द को भी मुस्कान में बदल देने वाला वह अभिनेता, जिसने जीवन के अंतिम पड़ाव तक सपने देखे और उन्हें पर्दे पर उतारता रहा और कहता रहा मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया

प्रेम में मिले दर्द को भी मुस्कान में बदल देने वाला वह अभिनेता, जिसने जीवन के अंतिम पड़ाव तक सपने देखे और उन्हें पर्दे पर उतारता रहा और कहता रहा मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया

लेखक : डॉ. राकेश दत्त मिश्र

26 सितंबर आते ही हिंदी सिनेमा की स्मृतियों में एक ऐसा चेहरा जीवंत हो उठता है, जिसकी मुस्कान में रोमांस था, आंखों में सपने थे, चाल में आत्मविश्वास था और व्यक्तित्व में जिंदगी को पूरी शिद्दत के साथ जीने का जुनून था। वह चेहरा था देव आनंद का। देव आनंद केवल एक अभिनेता नहीं थे, वे अपने आप में एक पूरा युग थे। वे अभिनेता थे, लेखक थे, निर्माता थे, निर्देशक थे और सबसे बढ़कर ऐसे फिल्मकार थे जिन्होंने अपने साथ-साथ अनेक प्रतिभाओं को भी आगे बढ़ने का अवसर दिया। हिंदी सिनेमा के इतिहास में बहुत से कलाकार आए और चले गए, लेकिन देव आनंद उन विरले कलाकारों में रहे जिनकी पहचान केवल उनकी फिल्मों से नहीं, बल्कि उनके जीवन जीने के अंदाज से भी बनी।

देव आनंद के जीवन को यदि किसी एक गीत में समेटने की कोशिश की जाए तो शायद हम दोनों का वह गीत सबसे अधिक सटीक बैठता है-“मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया।” यह केवल एक फिल्मी गीत नहीं था, बल्कि ऐसा लगता है जैसे देव आनंद ने इसे अपने जीवन का दर्शन ही बना लिया था। जिंदगी ने उन्हें भी बहुत कुछ दिया और बहुत कुछ उनसे छीना। प्रेम मिला तो बिछड़ने का दर्द भी मिला, सफलता मिली तो असफलताएं भी सामने आईं, लोकप्रियता मिली तो आलोचनाएं भी हुईं, लेकिन उन्होंने कभी जीवन के सामने घुटने नहीं टेके। वे हर परिस्थिति में आगे बढ़ते रहे और शायद यही उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी।

26 सितंबर 1923 को जन्मे देव आनंद ने हिंदी सिनेमा में जिस समय कदम रखा, वह दौर आज के चमकदार और तकनीकी रूप से विकसित फिल्म उद्योग से बिल्कुल अलग था। उस समय अभिनेता बनने का सपना देखना ही अपने आप में एक संघर्ष था। लेकिन देव आनंद में कुछ अलग करने की बेचैनी थी। उन्होंने अपनी प्रतिभा पर विश्वास किया और धीरे-धीरे फिल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाई। उनकी अदाकारी में एक खास तरह की सहजता थी। वे पर्दे पर आते थे तो ऐसा लगता था जैसे अभिनय नहीं कर रहे, बल्कि जिंदगी जी रहे हों। उनकी मुस्कान, उनकी आंखें, उनकी बोलने की शैली और उनकी विशिष्ट चाल देखते ही देखते उनकी पहचान बन गई।

लेकिन देव आनंद की कहानी केवल सफलता की कहानी नहीं है। उनके जीवन में प्रेम का अध्याय भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा। सुरैया और देव आनंद की प्रेम कहानी हिंदी फिल्म जगत की चर्चित प्रेमकथाओं में गिनी जाती है। दोनों के बीच गहरा लगाव था, लेकिन परिस्थितियां उनके पक्ष में नहीं थीं। यह रिश्ता विवाह तक नहीं पहुंच सका। किसी युवा मन के लिए यह बहुत बड़ा भावनात्मक आघात हो सकता था, लेकिन देव आनंद ने इस दर्द को अपनी जिंदगी की दीवार नहीं बनने दिया। प्रेम अधूरा रहा, लेकिन जीवन अधूरा नहीं होने दिया। उन्होंने उस पीड़ा को अपने भीतर रखा, मगर अपने कदम रोकने नहीं दिए।

यही शायद देव आनंद की सबसे बड़ी विशेषता थी—वे अतीत में कैद होकर नहीं रहे। जो बीत गया, उसे स्मृति में रखा, लेकिन भविष्य की ओर देखते रहे। उन्होंने यह साबित किया कि किसी रिश्ते का टूट जाना जीवन का अंत नहीं होता और किसी सपने का पूरा न होना इस बात का प्रमाण नहीं कि आगे कोई नया सपना नहीं देखा जा सकता।

देव आनंद ने केवल अपने लिए सफलता का रास्ता नहीं बनाया, बल्कि दूसरों के लिए भी दरवाजे खोले। अपने भाई चेतन आनंद के साथ मिलकर उन्होंने नवकेतन फिल्म्स की स्थापना की। नवकेतन केवल एक फिल्म निर्माण कंपनी नहीं थी, बल्कि हिंदी सिनेमा की अनेक प्रतिभाओं के लिए प्रयोग और अवसर का मंच बनी। देव आनंद की दूरदृष्टि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने ऐसे लोगों पर विश्वास किया जो आगे चलकर भारतीय सिनेमा के बड़े नाम बने। गुरु दत्त जैसे प्रतिभाशाली कलाकार को बाजी जैसी फिल्म के माध्यम से महत्वपूर्ण अवसर मिला। बाद में गुरु दत्त ने स्वयं भारतीय सिनेमा को नई ऊंचाइयां दीं।

देव आनंद की यही खूबी उन्हें केवल अभिनेता से आगे ले जाती है। वे प्रतिभा पहचानते थे। वे नए विचारों से डरते नहीं थे। वे जोखिम उठाते थे। वे जानते थे कि सिनेमा केवल एक अभिनेता के चेहरे से नहीं बनता, बल्कि लेखक, निर्देशक, संगीतकार, गीतकार, तकनीशियन और कलाकारों की सामूहिक प्रतिभा से बनता है। इसलिए उन्होंने अपने आसपास प्रतिभाशाली लोगों को स्थान दिया। एस.डी. बर्मन, साहिर लुधियानवी और विजय आनंद जैसे रचनाकारों के साथ उनकी रचनात्मक साझेदारी ने हिंदी सिनेमा को अनेक यादगार फिल्में दीं।

फिर आया गाइड का दौर। वर्ष 1965 में प्रदर्शित गाइड हिंदी सिनेमा की उन फिल्मों में शामिल हुई जिसने कहानी कहने की परंपरा को एक अलग दृष्टि दी। देव आनंद ने इसमें राजू की भूमिका निभाई। राजू कोई आदर्शवादी, पूर्ण और दोषरहित नायक नहीं था। उसमें कमजोरियां थीं, गलतियां थीं, भावनाएं थीं और जीवन से संघर्ष था। लेकिन वही संघर्ष उसे एक अलग यात्रा पर ले जाता है। देव आनंद ने इस जटिल चरित्र को जिस सहजता से निभाया, वह उनके अभिनय की क्षमता को दर्शाता है। वहीदा रहमान के साथ उनकी जोड़ी और विजय आनंद के निर्देशन ने इस फिल्म को यादगार बना दिया।

देव आनंद का जीवन हमें यह भी बताता है कि कलाकार यदि अपने समय को समझता है तो वह समय के साथ बदल सकता है। उन्होंने स्वयं को किसी एक दौर में बंद नहीं किया। जब अभिनय के बाद निर्माण का अवसर आया तो निर्माता बने, निर्देशन का अवसर मिला तो निर्देशक बने, कहानी और विचारों के साथ प्रयोग किया और नई पीढ़ी की संवेदनाओं को समझने की कोशिश की। उनकी कुछ फिल्में सफल हुईं, कुछ अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सकीं, लेकिन उन्होंने असफलता को अपने व्यक्तित्व पर हावी नहीं होने दिया।

आज के समय में हम सफलता को बहुत जल्दी मापने लगे हैं। एक फिल्म चली तो कलाकार सफल, दूसरी नहीं चली तो असफल। एक अवसर मिला तो जीवन सफल, एक अवसर हाथ से निकला तो निराशा। देव आनंद का जीवन इस सोच के बिल्कुल विपरीत खड़ा दिखाई देता है। उनके लिए सफलता किसी एक फिल्म का परिणाम नहीं थी। सफलता का अर्थ था लगातार काम करते रहना, लगातार सीखते रहना और लगातार कुछ नया करने का साहस रखना।

यही कारण है कि उम्र बढ़ने के साथ भी उनका उत्साह कम नहीं हुआ। जब उनके समकालीन अनेक कलाकारों ने काम से दूरी बना ली थी, देव आनंद अब भी फिल्म बनाने और नए विचारों पर काम करने की ऊर्जा रखते थे। उनकी अंतिम फिल्म Chargesheet वर्ष 2011 में प्रदर्शित हुई। उस समय वे जीवन के उस पड़ाव पर पहुंच चुके थे जहां सामान्यतः लोग सक्रिय जीवन से विश्राम की ओर बढ़ते हैं, लेकिन देव आनंद के भीतर का कलाकार विश्राम के लिए तैयार नहीं था। दिसंबर 2011 में 88 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी रचनात्मक बेचैनी अंतिम समय तक जीवित रही।

देव आनंद की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह नहीं थी कि उन्होंने कितनी फिल्में कीं या कितनी सफल फिल्में दीं। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने अपने भीतर के कलाकार को कभी मरने नहीं दिया। उन्होंने अपने चेहरे की लोकप्रियता को अपनी सीमा नहीं बनने दिया। उन्होंने उम्र को अपनी ऊर्जा का दुश्मन नहीं बनने दिया। उन्होंने असफलता को अपने आत्मविश्वास पर कब्जा नहीं करने दिया और प्रेम में मिली पीड़ा को जीवन से मोहभंग का कारण नहीं बनने दिया।

सुरैया से प्रेम और उस प्रेम का अधूरा रह जाना उनके जीवन की एक भावनात्मक घटना थी, लेकिन देव आनंद वहीं रुक नहीं गए। उन्होंने फिर प्रेम किया, जीवन जिया, काम किया, फिल्में बनाईं और आगे बढ़ते रहे। शायद यही उनके व्यक्तित्व की वास्तविक शक्ति थी। उन्होंने दर्द को स्वीकार किया, लेकिन दर्द को अपनी पहचान नहीं बनने दिया।

उनकी फिल्मों के गीत आज भी जब बजते हैं तो ऐसा लगता है जैसे देव आनंद कहीं आसपास ही हैं। उनकी मुस्कान पर्दे पर दिखाई देती है, उनकी आवाज सुनाई देती है और उनकी चाल में वही पुराना आत्मविश्वास नजर आता है। लेकिन इन सबके पीछे एक गहरा संदेश भी छिपा है-जिंदगी में परिस्थितियां हमारे अनुसार नहीं चलतीं, लेकिन हम परिस्थितियों के साथ कैसे चलते हैं, यह हमारे हाथ में होता है।

“मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया”—देव आनंद के जीवन को समझने के लिए शायद इससे बेहतर कोई पंक्ति नहीं हो सकती। उन्होंने सचमुच जिंदगी का साथ निभाया। जिंदगी ने उन्हें जहां पहुंचाया, उन्होंने वहां से आगे का रास्ता खोज लिया। प्रेम मिला तो उसका आनंद लिया, बिछड़ना आया तो आगे बढ़े, सफलता मिली तो उसका उत्सव मनाया, असफलता आई तो अगली फिल्म की तैयारी शुरू कर दी। यही उनकी जिजीविषा थी।

आज जब हम देव आनंद को उनकी जन्मतिथि पर याद करते हैं तो हमें केवल एक पुराने अभिनेता को याद नहीं करना चाहिए। हमें उस विचार को याद करना चाहिए जिसमें उम्र सपनों की सीमा नहीं होती, असफलता यात्रा का अंत नहीं होती और बिछड़ना जीवन का अंत नहीं होता। हमें उस कलाकार को याद करना चाहिए जिसने स्वयं के लिए रास्ता बनाया और उस रास्ते पर चलते हुए दूसरों के लिए भी रास्ते खोले।

देव आनंद की कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में ठहराव सबसे बड़ी हार है। आदमी गिर सकता है, टूट सकता है, असफल हो सकता है, किसी अपने को खो सकता है, लेकिन यदि उसके भीतर आगे बढ़ने की इच्छा बची हुई है तो कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है।

शायद इसी कारण देव आनंद आज भी हमारे बीच हैं। वे अपनी फिल्मों में हैं, अपने गीतों में हैं, अपनी मुस्कान में हैं, अपनी अदाकारी में हैं और सबसे अधिक उस जीवन-दर्शन में हैं जो कहता है—चलते रहो, सपने देखते रहो, काम करते रहो और जिंदगी को उसकी पूरी खूबसूरती के साथ जीते रहो।

देव आनंद चले गए, लेकिन उनका अंदाज नहीं गया। उनका आकर्षण नहीं गया। उनका सिनेमा नहीं गया। और सबसे बड़ी बात-जिंदगी को लेकर उनका उत्साह नहीं गया।

उनकी जन्मतिथि पर उन्हें यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम उनकी जिंदगी से प्रेरणा लें और अपने हिस्से की जिंदगी को शिकायतों में नहीं, कर्म में जिएं।

क्योंकि देव आनंद की तरह जिंदगी भी हमसे यही कहती है-

“मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया,
हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया।”

और शायद जीवन का सबसे सुंदर रहस्य भी यही है-रास्ते हमेशा तैयार नहीं मिलते, उन्हें चलते-चलते बनाना पड़ता है।

देव आनंद को उनकी जन्मतिथि पर शत-शत नमन।

देव आनंद की जन्मतिथि पर उन्हें याद करना केवल एक महान अभिनेता को श्रद्धांजलि देना नहीं है।

यह उस जीवन-दर्शन को प्रणाम करना है जिसमें प्रेम था, संघर्ष था, असफलता थी, सफलता थी, लेकिन ठहराव नहीं था।

वह चलते रहे।

फिल्में बनाते रहे।

सपने देखते रहे।

नई प्रतिभाओं को अवसर देते रहे।

और अंत तक अपने भीतर के कलाकार को जीवित रखा।

यही देव आनंद थे।

यही उनकी अमरता है।

और शायद यही जिंदगी का सबसे सुंदर संदेश भी-

चलते रहिए...
क्योंकि जिंदगी रुकने का नाम नहीं,
चलते रहने का नाम है।

डॉ. राकेश दत्त मिश्र
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