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गया जी में ऑनलाइन पिंडदान की व्यवस्था पर सनातनियों का कड़ा आक्रोश: विद्वानों ने बताया अशास्त्रीय, सरकार व प्रशासन से तत्काल रोक की मांग

गया जी में ऑनलाइन पिंडदान की व्यवस्था पर सनातनियों का कड़ा आक्रोश: विद्वानों ने बताया अशास्त्रीय, सरकार व प्रशासन से तत्काल रोक की मांग

विश्वविख्यात मोक्षधाम गया जी में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले ऐतिहासिक पितृपक्ष महामेले के दौरान देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु अपने पितरों के मोक्ष और आत्मिक शांति के लिए सदेह उपस्थित होते हैं। परंतु हाल के दिनों में आधुनिकता और डिजिटल सुविधा के नाम पर शुरू किए जा रहे 'ऑनलाइन पिंडदान' और इसके व्यावसायिक विज्ञापनों ने सनातन समाज, धर्माचार्यों एवं तीर्थ पुरोहितों में गहरा आक्रोश पैदा कर दिया है।

इस गंभीर विसंगति और धर्म के मूल सिद्धांतों के उल्लंघन को लेकर गया जी स्थित भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच के अध्यक्ष डॉ. विवेकानंद मिश्रा के आवास पर एक उच्चस्तरीय व विस्तृत विचार-विमर्श सभा का आयोजन किया गया। सभा में उपस्थित समस्त विद्वानों, धर्माचार्यों और प्रबुद्धजनों ने एक स्वर में ऑनलाइन पिंडदान को पूरी तरह अशास्त्रीय, अवैध और आस्था के साथ खुला छल करार दिया।

पिंडदान का शास्त्रीय व आध्यात्मिक विधान: भौतिक उपस्थिति क्यों अनिवार्य है?
सभा के दौरान प्रख्यात आचार्यों ने धर्मशास्त्रों, स्मृतियों और पुराणों के आलोक में गया श्राद्ध के शास्त्रीय विधान पर विस्तार से प्रकाश डाला:

'सदेह' उपस्थिति और प्रत्यक्ष संकल्प का नियम:

शास्त्रों के अनुसार, श्राद्ध कर्म केवल एक औपचारिक क्रिया नहीं, बल्कि कर्ता (पुत्र अथवा उत्तराधिकारी) और पितरों के मध्य सूक्ष्म आध्यात्मिक संबंध की पुनर्स्थापना है। गरुड़ पुराण, वायु पुराण एवं निर्णयसिन्धु जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में स्पष्ट है कि पिंडदान का फल तभी प्राप्त होता है जब कर्ता स्वयं उपस्थित होकर अपने हाथ में पवित्र कुशा (दर्भ), अक्षत, काले तिल और जल लेकर संकल्प करता है। बिना कर्ता के प्रत्यक्ष स्पर्श, संकल्प और भाव के श्राद्ध निष्फल माना जाता है।

पंचमहाभूत और द्रव्य का प्रत्यक्ष संपर्क:


पिंडदान में पिंड का निर्माण (जौ का आटा, तिल, घी, मधु आदि से), फल्गू नदी के पावन जल से अभिषेक, और कर्ता द्वारा अपने कर-कमलों (हाथों) से वेदी पर पिंड समर्पित करने का विशेष विधान है। इंटरनेट या मोबाइल स्क्रीन के जरिए न तो द्रव्य का स्पर्श संभव है और न ही पंचमहाभूतों के माध्यम से पितरों तक हविष्य पहुँच सकता है।

तीर्थ पुरोहितों की 'सुफल' परंपरा व शास्त्रीय मर्यादा:

गया श्राद्ध की सदियों पुरानी सनातन व्यवस्था है कि यहाँ आने वाले यजमान अपने कुल तीर्थ पुरोहित (गयापाल पंडा समाज) से आज्ञा प्राप्त करते हैं और विद्वान ब्राह्मण आचार्यों के सानिध्य में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ कर्मकांड संपन्न कराते हैं। अंत में तीर्थ पुरोहित द्वारा दिया जाने वाला आशीर्वाद ('सुफल') ही इस अनुष्ठान की पूर्णता मानी जाती है। ऑनलाइन व्यवस्था इस प्राचीन गुरु-शिष्य और यजमान-पुरोहित की शास्त्रीय कड़ी को पूरी तरह ध्वस्त करती है।

दूरस्थ श्राद्ध के भ्रम का खंडन:


विद्वानों ने स्पष्ट किया कि यद्यपि विशेष परिस्थितियों (जैसे असमर्थता या अशौच) में शास्त्र प्रतिनिधि द्वारा श्राद्ध की बात कहते हैं, लेकिन वह भी विधि-सम्मत प्रत्यक्ष नियमों के अधीन होता है। किसी कॉर्पोरेट कंपनी, एजेंट या पोर्टल द्वारा पैसे लेकर वीडियो कॉल पर पिंड दिखाना किसी भी शास्त्र में मान्य नहीं है। यह सीधे तौर पर पूर्वजों की आत्मा का अनादर और धार्मिक कर्मकांड का व्यवसायीकरण है।

आधुनिकता के नाम पर शास्त्रीय परंपराओं का हनन बर्दाश्त नहीं: डॉ. विवेकानंद मिश्रा

सभा की अध्यक्षता करते हुए डॉ. विवेकानंद मिश्रा ने कड़े शब्दों में कहा:

"सनातन धर्म की सदियों पुरानी परंपराओं को आधुनिक सुविधा के नाम पर विकृत करना घोर पाप है। पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मकांड में कर्ता की स्वयं की भौतिक उपस्थिति अनिवार्य है। तकनीक का उपयोग टिकट बुकिंग, सूचना प्रसार या प्रशासनिक व्यवस्थाओं के लिए तो स्वागत योग्य है, लेकिन श्राद्ध और पिंडदान जैसे संवेदनशील, पवित्र और सूक्ष्म आध्यात्मिक विधानों को मोबाइल स्क्रीन तक सीमित कर देना सीधे तौर पर हमारे पूर्वजों का अपमान और एक व्यावसायिक ढोंग है। इसका हर स्तर पर पुरजोर विरोध किया जाएगा।"

धर्मग्रंथों में आभासी पिंडदान का कोई स्थान नहीं: आचार्य सच्चिदानंद मिश्रा 'नैकी'

सभा में उपस्थित प्रख्यात आचार्य सच्चिदानंद मिश्रा 'नैकी' ने विभिन्न धर्मग्रंथों का संदर्भ देते हुए कहा:

"हमारे किसी भी वेद, स्मृति या पुराण में आभासी (ऑनलाइन) माध्यम से पिंडदान का कोई विधान नहीं है। जब तक श्रद्धालु स्वयं फल्गू के जल, तिल, कुश और पिंड को स्पर्श कर मंत्रोच्चार के साथ तर्पण नहीं करता, तब तक वह कर्म निष्फल रहता है। आज कुछ व्यावसायिक तत्व तकनीक की आड़ में देश-विदेश के श्रद्धालुओं की श्रद्धा का दोहन कर रहे हैं। यह न केवल सनातन आस्था के साथ धोखा है, बल्कि तीर्थ की गरिमा को भी चोट पहुँचा रहा है।"


केंद्र, राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन को भेजा गया ज्ञापन

सभा के अंत में सर्वसम्मति से एक निंदा प्रस्ताव पारित किया गया और तुरंत प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग की गई। भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा और कौटिल्य मंच की ओर से भारत सरकार के गृह मंत्रालय, बिहार के माननीय मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, गया के जिलाधिकारी एवं पितृपक्ष मेला कार्यक्रम पदाधिकारी को विस्तृत ज्ञापन प्रेषित कर निम्नलिखित मांगें रखी गईं:
वेबसाइटों व पोर्टलों पर अविलंब रोक: गया जी के नाम पर ऑनलाइन पिंडदान, ई-पिंडदान या आभासी श्राद्ध की सेवाएं बेचने वाली सभी निजी कंपनियों, ट्रस्टों और पोर्टलों पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाए।

दंडात्मक कानूनी कार्रवाई: आस्था के नाम पर श्रद्धालुओं को ठगने और धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ करने वाले आयोजकों पर धोखाधड़ी और धार्मिक मानहानि की धाराओं में प्राथमिकी (FIR) दर्ज हो।

जागरूकता अभियान: जिला प्रशासन और मेला समिति द्वारा आधिकारिक तौर पर यह स्पष्ट किया जाए कि गया श्राद्ध में भौतिक उपस्थिति ही शास्त्रसम्मत है, ताकि भोले-भाले श्रद्धालु ठगी का शिकार न हों।


सभा में भारी संख्या में जुटे धर्माचार्य, पुरोहित और गणमान्य नागरिक

इस विरोध सभा में बड़ी संख्या में स्थानीय विद्वानों, सामाजिक प्रतिनिधियों एवं नागरिकों ने भाग लिया और इस आंदोलन को जन-जन तक ले जाने का संकल्प लिया।

सभा में मुख्य रूप से उपस्थित रहने वालों में:

आचार्य लाल भूषण मिश्र, आचार्य अरुण मिश्र, मधुप चरण, बाबू डालमिया, सुजीत कुमार सिन्हा, संदीप मिश्र, संदीप पाठक, हृदय कुमार, दीपक, अतुल कुमार मिश्रा, सूरज कुमार मिश्रा, विवेक कुमार, सीताराम पासवान, फूल कुमारी, स्वामी सुमन गिरी, पंडित बल मुकुंद मिश्र, डॉ. ज्ञानेश भारद्वाज, आशुतोष मिश्र, रंजीत पाठक, पवन मिश्र, डॉ. राम किशोर पाठक, प्यारी देवी, सुनील कुमार पाठक, अभय पाठक, नवल किशोर मिश्र, विनय कांत मिश्र, सीता देवी, सुखदेव पंडित, अजय मिश्र, गजाधर लाल पाठक, गजाधर लाल कटरियार, डॉ. जितेंद्र मिश्र, ऋषिकेश गुर्दा, राजीव नयन पांडे, अशोक दूबे, डॉ. विनोद कुमार मिश्र, पुष्पलता चौबे, महेश मिश्र, हरिनारायण त्रिपाठी, सत्येंद्र दूबे, उषा सिंह, विश्वजीत चक्रवर्ती, चंद्रभूषण मिश्र, दीपक पाठक, साकेत रंजन मिश्र, डॉ. दिनेश कुमार, डॉ. रविंद्र कुमार, प्रोफेसर सुनील पाठक, विक्रम कुमार मिश्र, अमरनाथ मिश्र, रजनी चावला, सुनीता, संजय वैद्य, डॉ. छोटे बाबू, राम विनय शर्मा, देवेंद्र कुमार पाठक (बकरौर), आनंद कुमार मिश्र, अमरनाथ पाण्डेय, विनोद तिवारी, दिलीप कुमार द्विवेदी, विजय बाबू, पप्पू बाबू, राजेश बाबू, सविता देवी, मांडवी गुर्दा, शंभू लाल, वीर बहादुर राय, रजनी कुमारी, रागिनी सिंह, अनिता देवी, विशाल रंजन, अनिल कुमार, मृदुला मिश्रा, डिंपल कुमारी, मनीष कुमार, रणजीत बाबू, कृष्ण प्रसाद, प्रमिला देवी, दिलीप कुमार, नीरज वर्मा, शंभू गिरी, पुष्पा, रणजीत मिश्रा, हरिद्वार मिश्र, शारदा साहिबा, ज्ञानेश कुमार पांडे, कुंदन मिश्र, नीरज मिश्र, कुमारी पार्वती, नीरू, प्रियंका कुमारी, अमरेंद्र कुमार सिंह, राजेश त्रिपाठी, मुन्ना सिंह, बृजेंद्र सिंह, अभय कुमार सिंह, सुनील कुमार, राजकुमार यादव और धीरज कुमार प्रमुख रूप से शामिल रहे।

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