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"श्रावणी छाया"

"श्रावणी छाया"

(जलहरण घनाक्षरी)
रचना - डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
कदम्ब का डार डोले,
तन डोले हौले हौले,
हरित वितान तले, हास-विलासन झर।

धान रोपें जो विहुनी
गाते गीत हैं किसान,
पंकिल चरन चूमे, सफल संवेद सुध।


कूलों से छलकें नीर,
तीव्र तरंगें मचलें,
उन्मादिनी सरिताएँ, सिंधु-पथ पे नि-डर।


मेंहदी रचे है कर,
कजरा सजे है दृग,
हरी चूड़ियाँ खनकें, हँसते अधर पर।


भीगी है अटारी पर,
निशि जागे विरहिणी,
मेघों से पूछती रहे, कब आए निज घर।


बोल-बम नारा गूँजे,
सब शिवालय सजें,
गंगाजल अर्पित है, भाव-भक्ति झुके सर।


रक्षा-सूत्र स्नेह बाँधे,
तीज-गीत गूँजें घर,
इन बंधनों की डोरी, सुरभि जीवन भर।


श्रावण का आगमन,
प्रेमामृत का वर्षण, धरा से अंबर तक, मंगल-सृजन झर।
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