उत्तर बिहार की।सांस्कृतिक विरासत
सत्येन्द्र कुमार पाठक
उत्तर बिहार (गंगा नदी के उत्तर का मैदानी भाग) न केवल भारत का एक विशिष्ट भौगोलिक अंचल है, बल्कि यह सनातन वैदिक परंपरा, पौराणिक संदर्भों, श्रमण दर्शनों (बौद्ध एवं जैन) और लोक-संस्कृतियों के अनूठे संगम का प्रतीक रहा है। लगभग 53,300 वर्ग किलोमीटर में फैला यह क्षेत्र पूरे बिहार राज्य के कुल क्षेत्रफल (~94,163 वर्ग किमी) का लगभग 56.6% हिस्सा आच्छादित करता है। पौराणिक मन्वंतर काल से लेकर आधुनिक युग तक, इस क्षेत्र की चेतना हिमालय की तराई से निकलने वाली पवित्र नदियों—सरयू, गंडक, बागमती, कमला, कोसी और महानंदा—के जल-प्रवाह से सींचित हुई है। इन नदियों के तटों पर केवल कृषि और व्यापार ही नहीं पनपा, बल्कि यहाँ विश्व के प्रथम गणतंत्रों का उदय हुआ, उपनिषदों के ब्रह्मज्ञान का मंथन हुआ और बौद्ध तथा जैन धर्म जैसे युग-प्रवर्तक दर्शनों की नीव रखी है ।
उत्तर बिहार मुख्य रूप से नेपाल हिमालय से निकलने वाली सदा नीरा (सदाबहार) एवं मौसमी नदियों का मैदानी इलाका है। यह नदियाँ अपने साथ हिमालयी गाद लाकर इस भूमि को अत्यंत उर्वर बनाती हैं।
घाघरा (सरयू): देवरिया/सिवान सीमा से बिहार में प्रवेश करती है और छपरा के निकट गंगा में मिलती है।गंडक (गंडकी/नारायणी): वाल्मीकिनगर (पश्चिम चंपारण) से प्रवेश कर हाजीपुर-सोनपुर के पास गंगा में विलीन होती है।बूढ़ी गंडक: विशंभरपुर (पश्चिम चंपारण) के चौर (जलमग्न क्षेत्र) से निकलकर मुंगेर के सामने गंगा में गिरती है।बागमती: नेपाल की शिवपुरी पहाड़ियों से निकलकर सीतामढ़ी के रास्ते बिहार में प्रवेश करती है और दरभंगा-खगड़िया क्षेत्र में विभिन्न धाराओं में बँटती है।कमला एवं कमला-बलान: मधुबनी जिले के जयनगर से प्रवेश कर मिथिलांचल के मैदानी भागों को सींचती है।कोसी (सप्तकोशी): सुपौल के भीमनगर से प्रवेश करती है। अपने निरंतर मार्ग-परिवर्तन के कारण प्रसिद्ध यह नदी कटिहार के कुरसेला में गंगा से मिलती है।महानंदा: किशनगंज में प्रवेश कर कटिहार के निकट नवाबगंज में गंगा-मेघना जल-तंत्र का हिस्सा बनती है। अधवारा नदी समूह: यह बागमती की सहायक धाराओं (लालबकेया, लखनदेई, जमुने, गाछी आदि) का एक जटिल जल-नेटवर्क है।
संकटग्रस्त एवं विलुप्तप्राय नदियाँ में मानवीय अतिक्रमण, बाँधों के निर्माण, भारी गाद (siltation) और प्राकृतिक धाराओं के अवरुद्ध होने से उत्तर बिहार की कई पौराणिक एवं स्थानीय नदियाँ या तो विलुप्त हो चुकी हैं या अत्यंत संकुचित होकर नाले में बदल गई हैं: सरस्वती (स्थानीय) चंपारण क्षेत्र (त्रिवेणी) गंडक/नारायणी की सहायक धारा अतिक्रमण के कारण विलुप्त/सकरा नाला बन चुकी है।सरिसवा (सरीसवा) पूर्वी एवं पश्चिम चंपारण (रक्सौल/सुगौली) बूढ़ी गंडक तंत्र औद्योगिक प्रदूषण एवं अतिक्रमण से अस्तित्व के संकट में। लखनदेई (लखनवती) सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर बागमती/दरभंगा क्षेत्र गाद जमा होने से विलुप्तप्राय; हाल में पुनरुद्धार प्रयास शुरू।।जमुने / लालबकेया सीतामढ़ी, शिवहर अधवारा/बागमती तंत्र मौसमी जलधारा या नाले के रूप में सिमटी।।बलान (प्राचीन धारा) मधुबनी, दरभंगा कोसी/कमला तंत्र मार्ग परिवर्तन के कारण प्राचीन धाराएँ सूख चुकी हैं। धौस / रोहिणी मधुबनी (नेपाल सीमावर्ती) कमला-अधवारा संकुचित होकर केवल बरसात में बहती है।।तुलिया / डांक पूर्णिया, कटिहार महानंदा मुख्य धारा गाद भरने से मुख्य धारा विलीन हो गई।
उत्तर बिहार के जल-संगम व्यापारिक, रणनीतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से आर्यावर्त के केंद्र-बिंदु रहे हैं: वैशाली (विशालनगरी / हाजीपुर क्षेत्र) गंडक (नारायणी) और गंगा का पवित्र संगम पर इक्ष्वाकु वंश के राजा विशाल द्वारा स्थापित; बाद में वज्जि संघ (लिच्छवी गणराज्य) का केंद्र था । विश्व का प्रथम लोकतांत्रिक गणराज्य। भगवान महावीर की जन्मस्थली (कुंडग्राम) और महात्मा बुद्ध की कर्मस्थली।. हरिहर क्षेत्र (हाजीपुर-सोनपुर एवं पाटलिपुत्र का उत्तरी तट) गंडक, सरयू, सोन और गंगा का महान जल-संगम। हर्यक वंश, मौर्य साम्राज्य एवं गुप्त शासक। जलमार्गों पर नियंत्रण हेतु सैन्य चौकियाँ स्थापित हुईं। पौराणिक मान्यतानुसार यह गज-ग्राह के युद्ध (गजेन्द्र मोक्ष) की भूमि है। जनकपुर - विदेह क्षेत्र (मिथिला) कमला, बागमती और अधवारा नदियों का मैदानी भाग में विदेह राजवंश (राजा निमि, मिथि जनक, सिरध्वज जनक) का ब्रह्मज्ञान, वेदांत दर्शन, शतपथ ब्राह्मण की रचना तथा माता सीता की प्राकट्य स्थली थी । मुंगेर-खगड़िया उत्तर तट (गंगा-बूढ़ी गंडक संगम) का संस्थापक/शासक: अंग साम्राज्य, गुप्त वंश एवं पाल राजवंश (राजा देवपाल) था । पाल शासकों ने मुंगेर को अपनी प्रशासनिक एवं सैन्य राजधानी बनाकर उत्तर-दक्षिण जल-व्यापार पर नियंत्रण रखा था । - उत्तर वैदिक काल में राजा मिथि जनक द्वारा विदेह साम्राज्य की स्थापना। शतपथ ब्राह्मण में वर्णित 'माठव विदेघ' की कथा, जिन्होंने पुरोहित गौतम राहूगण के साथ अग्नि-संस्कृति को सदानीरा (गंडक) पार कराकर मिथिला में स्थापित किया। महर्षि याज्ञवल्क्य, गार्गी और मैत्रेयी द्वारा उपनिषद साहित्य की रचना है।
महाजनपद काल (गणतंत्रात्मक क्रांति) 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में वैशाली में वज्जि संघ (लिच्छवियों) का उदय, जिन्होंने शासन की अष्टकुली व्यवस्था दी। इसी काल में भगवान महावीर और गौतम बुद्ध के उपदेशों से श्रमण संस्कृति का प्रसार हुआ। मौर्य एवं गुप्त साम्राज्य।का 4वीं श. ई.पू. - 6वीं श. ईस्वी।में सम्राट अशोक ने उत्तर बिहार के व्यापारिक मार्गों (उत्तरापथ) पर एकाश्म स्तंभ (लौरिया अरेराज, लौरिया नंदनगढ़, रामपुरवा) बनवाए। गुप्त काल में वैशाली 'तिरभुक्ति' (तिरहुत) प्रांत का प्रशासनिक मुख्यालय बना।।पाल एवं कर्नाट राजवंश का
8वीं - 14वीं शताब्दी ईस्वी में पाल वंश के संरक्षण में बौद्ध कला और शिक्षा स्थलों का विकास। 1097 ई. में नान्यदेव ने कर्नाट वंश की नींव रखी। राजा हरिसिंह देव के समय मैथिलों के लिए प्रसिद्ध 'पंजी प्रबंध' (वंशवृक्ष रिकॉर्ड प्रणाली) लागू हुई।।ओइनवार वंश एवं दरभंगा राज का 14वीं - 20वीं शताब्दी ईस्वी में ओइनवार शासक राजा शिवसिंह और महाकवि विद्यापति के काल में मैथिली साहित्य का स्वर्ण काल आया। बाद में खंडवाला कुल (दरभंगा राज) और बेतिया राज ने शिक्षा, कला, रेल और स्थापत्य को अभूतपूर्व बढ़ावा दिया। 1917 में महात्मा गांधी ने चंपारण की भूमि से सत्याग्रह का पहला प्रयोग किया।
उत्तर बिहार के 21 जिले और उनकी नदियाँ में पश्चिम चंपारण बेतिया बूढ़ी गंडक (चंद्रावत नाला) / गंडक , पूर्वी चंपारण मोतिहारी मोतीझील / बूढ़ी गंडक , सीतामढ़ी सीतामढ़ी लखनदेई एवं बागमती , शिवहर शिवहर बागमती , मुजफ्फरपुर मुजफ्फरपुर बूढ़ी गंडक , वैशाली हाजीपुर गंडक (नारायणी) एवं गंगा , दरभंगा दरभंगा बागमती (अधवारा समूह) एवं कमला , मधुबनी मधुबनी जीबछ / कमला बलान
समस्तीपुर समस्तीपुर बूढ़ी गंडक , बेगूसराय बेगूसराय बूढ़ी गंडक (दक्षिण में गंगा) , खगड़िया खगड़िया बागमती, बूढ़ी गंडक एवं कोसी संगम , सहरसा सहरसा कोसी , सुपौल सुपौल कोसी , मधेपुरा मधेपुरा सुरसर (कोसी की सहायक) , पूर्णिया पूर्णिया सौरा नदी , कटिहार कटिहार महानंदा एवं कोसी-गंगा संगम, किशनगंज किशनगंज महानंदा एवं रमजान नदी ,अररिया अररिया परमान नदी , सिवान सिवान दाहा नदी (घाघरा तंत्र) ,गोपालगंज गोपालगंज गंडक (नारायणी) , सारण छपरा घाघरा (सरयू) एवं गंगा नदी है।
उत्तर बिहार में सनातन देव-उपासना (सौर, शाक्त, ब्रह्म, शैव, वैष्णव) तथा श्रमण दर्शनों (बौद्ध एवं जैन) का अभूतपूर्व समन्वय देखने को मिलता है । - वैष्णव (पुनौरा, सोनपुर) , सौर सम्प्रदाय (सूर्य उपासना)काल व साम्राज्य: विदेह राजवंश से लेकर ओइनवार एवं कर्नाट काल।।: राजा जनक के युग से प्रातःकालीन सूर्य अर्घ्य परंपरा आरंभ हुई। ओइनवार काल में राजा शिवसिंह व विद्यापति के समय इसे लोक-पर्व का रूप मिला। उत्तर बिहार का महापर्व छठ प्राचीन सौर-उपासना का जीवंत रूप है।. शाक्त सम्प्रदाय (शक्ति साधना एवं तंत्र)
प्रमुख केंद्र: उचैठ भगवती (मधुबनी), महिषी उग्रतारा (सहरसा), चंडीस्थान (कटिहार), राजराजेश्वरी मंदिर (दरभंगा)।: कर्नाट वंश और दरभंगा राज।: उचैठ में महाकवि कालिदास को देवी कृपा प्राप्त हुई थी, वहीं महिषी तांत्रिक पीठ के रूप में विख्यात रहा जहाँ मंडन मिश्र की पत्नी भारती ने आदिशंकराचार्य से शास्त्रार्थ किया था।
. ब्रह्म सम्प्रदाय (दर्शन एवं उपनिषद): विदेहराज सिरध्वज जनक की सभा दार्शनिकों का केंद्र थी। शतपथ ब्राह्मण की रचना और उपनिषदों के अद्वैत दर्शन का प्रतिपादन इसी भूमि पर हुआ। मिथिला को 'न्याय दर्शन' और 'पूर्व मीमांसा' की जननी कहा जाता है।. शैव सम्प्रदाय (शिव उपासना) कुशेश्वरस्थान (दरभंगा), कपिलेश्वरस्थान (मधुबनी), सिंहेश्वरस्थान (मधेपुरा), बाबा गरीबनाथ (मुजफ्फरपुर), अरेराज सोमेश्वरनाथ (पूर्वी चंपारण) ओइनवार काल में महाकवि विद्यापति ने 'नचारी' और 'महेशवाणी' गीतों की रचना कर शैव मत को घर-घर पहुँचाया।. वैष्णव सम्प्रदाय पुनौरा धाम (सीतामढ़ी), वैशाली, बेतिया, सोनपुर। माता सीता के प्राकट्य स्थल (पुनौरा धाम) और श्रीराम-जानकी विवाह प्रसंग से यह क्षेत्र राम-भक्ति का विश्व प्रसिद्ध केंद्र बना। गुप्त सम्राटों ने परम-भागवत उपाधि धारण कर इस क्षेत्र में विष्णु मंदिरों का निर्माण कराया।. जैन संस्कृति काल एवं क्षेत्र: 6वीं शताब्दी ई.पू.; वैशाली (कुंडग्राम) और मिथिलांचल। 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म वैशाली के कुंडग्राम में हुआ। वज्जि संघ के लिच्छवी प्रमुख राजा चेटक ने जैन धर्म को पूर्ण संरक्षण दिया (राजा चेटक की बहन त्रिशला भगवान महावीर की माता थीं)। इसके अतिरिक्त 19वें (मल्लिनाथ), 21वें (नमिनाथ) और 22वें (अरिष्टनेमि) तीर्थंकरों का संबंध भी मिथिला भूमि से जोड़ा जाता है।. बौद्ध संस्कृति , वैशाली, केसरिया (पूर्वी चंपारण), लौरिया नंदनगढ़। भगवान बुद्ध ने वैशाली में अपना अंतिम उपदेश दिया और संघ में महिलाओं (प्रजापति गौतमी) के प्रवेश की अनुमति दी। केसरिया में विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप स्थित है। सम्राट अशोक एवं पाल राजाओं ने बौद्ध स्तूपों व विहारों का जीर्णोद्धार कराया था ।
महर्षि याज्ञवल्क्य (उत्तर वैदिक काल) , जनकपुर / जगबन (मधुबनी) , शुक्ल यजुर्वेद के द्रष्टा। राजा जनक के दरबार में अन्य विद्वानों को पराजित कर 'बृहदारण्यक उपनिषद' के अमूल्य ब्रह्मज्ञान का प्रतिपादन किया।
महर्षि गौतम (पौराणिक काल) , अहियारी (अहिल्या स्थान, कमतौल, दरभंगा) , 'न्याय दर्शन' के प्रणेता। अहियारी स्थित आश्रम में प्रभु श्रीराम द्वारा पाषाण-शिला बनी माता अहिल्या का उद्धार हुआ। महर्षि वाल्मीकि (रामायण काल) : वाल्मीकिनगर (पश्चिम चंपारण) , रामायण के रचयिता। चंपारण के घने वनों में इनका आश्रम था, जहाँ लव-कुश का जन्म हुआ और माता सीता ने अंतिम समय बिताया।।श्रृंगी ऋषि (त्रेता युग) का : सिंहेश्वरस्थान (मधेपुरा) कोसी-मिथिला क्षेत्र में तपस्या की। राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराया, जिससे श्रीराम आदि चारों भाइयों का जन्म हुआ। महर्षि कपिल (पौराणिक काल) में कपिलेश्वरस्थान (मधुबनी) 'सांख्य दर्शन' के प्रणेता। कपिलेश्वर में सरोवर तट पर शिवलिंग स्थापित कर तपस्या की थी ।
महर्षि अष्टावक्र (उपनिषद काल) में विदेह राजदरबार (मिथिला) , 12 वर्ष की अल्प आयु में राजा जनक की सभा में शास्त्रार्थ जीता और 'अष्टावक्र गीता' के माध्यम से अद्वैत वेदांत का प्रतिपादन किया।।गार्गी एवं मैत्रेयी (उत्तर वैदिक काल) , जनकपुर (मिथिला) , भारत की महान विदुषी नारियाँ। गार्गी ने महर्षि याज्ञवल्क्य के साथ ब्रह्मज्ञान पर ऐतिहासिक शास्त्रार्थ किया। , मंडन मिश्र एवं भारती (8वीं शताब्दी ईस्वी)।स्थान: महिषी (सहरसा) / पंडौल (मधुबनी) , पूर्व मीमांसा के महान आचार्य। महिषी में जगद्गुरु आदिशंकराचार्य के साथ मंडन मिश्र एवं उनकी पत्नी देवी भारती का एतिहासिक शास्त्रार्थ हुआ। भाषाई विविधता एवं लोक-अरण्य संस्कृति , उत्तर बिहार की बोलियाँ और भाषाएँ , मैथिली: दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा आदि में बोली जाने वाली संवैधानिक भाषा (8वीं अनुसूची)। इसकी लिपि 'तिरहुता' एवं देवनागरी है। , भोजपुरी: सारण, सिवान, गोपालगंज और पश्चिम व पूर्वी चंपारण के इलाकों में प्रचलित। बज्जिका: मुजफ्फरपुर, वैशाली, शिवहर और समस्तीपुर के कुछ भागों की मुख्य बोली। यह मैथिली और भोजपुरी की मिठास का सुंदर संकर रूप है। अंगिका: खगड़िया, बेगूसराय के पूर्वी हिस्से तथा कटिहार क्षेत्र में बोली जाती है।।थारू भाषा: पश्चिम चंपारण के तराई जंगलों में रहने वाले थारू समुदाय की अपनी लोक-बोली। प्राचीन अरण्य (वन) एवं ऋषियों के साधना स्थल चम्पकारण्य (चंपारण्य): चंपा के वृक्षों से आच्छादित विशाल वन (वर्तमान वाल्मीकिनगर/तराई क्षेत्र)। यहाँ महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था। सरभंग अरण्य: गंडक-कोसी तराई का क्षेत्र जहाँ ऋषि सरभंग और श्रृंगी ऋषि ने साधना की। गौतम अरण्य: कमतौल (दरभंगा) के अहियारी का क्षेत्र जो आम्रकुंजों और कल्पवृक्षों से घिरा घने वनों का भाग था।।कपिलेश्वर अरण्य: मधुबनी का वह क्षेत्र जहाँ महर्षि कपिल ने घने जंगलों के बीच तालाब के निकट सांख्य दर्शन का चिंतन किया है ।
मुजफ्फरपुर का श्री गरीबनाथ मंदिर (प्रारंभिक उपासना सम्प्रदाय) - उत्तर बिहार का 'बाबाधाम' कहे जाने वाले मुजफ्फरपुर के श्री गरीबनाथ मंदिर की जड़ें नाथ संप्रदाय (नाथ पंथ) और शैव सम्प्रदाय की अघोर/नागा-साधु उपासना परंपरा से जुड़ी हैं ।प्राचीन काल में यहाँ पीपल और बरगद का एक घना वृक्ष था। जब भूमि मालिक ने इसे कटवाना शुरू किया, तो कुल्हाड़ी की चोट से स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ और उससे लाल धारा बहने लगी। भोलेनाथ द्वारा निर्धनों और असहायों की मनोकामना तुरंत पूरी करने के कारण इनका नाम 'गरीबनाथ' पड़ा। प्रारंभ में नाथ साधुओं एवं तांत्रिक-शैवों ने यहाँ आराधना की, जो कालांतर में जन-जन की आस्था का केंद्र बन गया।।सोनपुर का हरिहरनाथ मंदिर (हरि-हर समन्वय) - गंडक और गंगा के संगम पर स्थित सोनपुर का हरिहरनाथ मंदिर शैव (हर/शिव) और वैष्णव (हरि/विष्णु) मतों के अद्भुत समन्वय का प्रतीक है।: गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग आधा शिव (हर) और आधा विष्णु (हरि) का संयुक्त रूप है: यहाँ 'गज' और 'ग्राह' का युद्ध हुआ था, जिसमें भगवान विष्णु (हरि) ने अपने भक्त गज का उद्धार किया था। मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने स्वयं इस संगम पर हरि और हर के संयुक्त रूप की स्थापना की थी। महर्षि कात्यायन का क्षेत्र (कात्यायनी पीठ) - यजुर्वेद की 'कात्यायन श्रौतसूत्र' के रचयिता और व्याकरण के महान वार्तिककार महर्षि कात्यायन का मुख्य कार्यक्षेत्र प्राचीन मिथिला (विदेह) का दक्षिणी-पूर्वी मैदानी भाग था। कात्यायनी पीठ (सहरसा-खगड़िया सीमा): धमरा घाट के निकट बागमती और कोसी के बीहड़ संगम-स्थल को महर्षि कात्यायन की प्रधान तपोभूमि माना जाता है। यहाँ उन्होंने भगवती की कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर देवी ने उनकी पुत्री 'कात्यायनी' (नवदुर्गा का छठा रूप) के रूप में जन्म लिया था ।
उत्तर बिहार की भूमि केवल भौतिक धरातल या नदियों का मैदान मात्र नहीं है; यह भारत के चिंतन, दर्शन, अध्यात्म और गणतांत्रिक मूल्यों का पालना रही है। जहाँ गंडक और बागमती जैसी नदियाँ भौतिक जीवन को समृद्धि देती हैं, वहीं याज्ञवल्क्य, गौतम, वाल्मीकि और कात्यायन जैसे ऋषियों की साधना ने यहाँ की माटी को वैचारिक ऊर्जा से भरा है। वैशाली के गणतंत्र से लेकर चंपारण के सत्याग्रह तक, उत्तर बिहार ने हर युग में भारतवर्ष को एक नई दिशा दिखाई है। मिथिला का मध्यकालीन इतिहास भारतीय इतिहास और संस्कृति का एक अत्यंत समृद्ध और गौरवशाली अध्याय है। 11वीं से 16वीं शताब्दी के दौरान कर्नाट राजवंश और ओइनवार राजवंश के संरक्षण में मिथिला केवल राजनीतिक दृष्टि से ही सुदृढ़ नहीं हुई, बल्कि साहित्य, कला, न्याय दर्शन और सामाजिक प्रशासन के क्षेत्र में भी एक वैश्विक केंद्र बनकर उभरी।
कर्नाट राजवंश (1097 ई. – 1324 ई.) में कर्नाट वंश की स्थापना 1097 ई. में नन्यदेव ने की थी। नन्यदेव मूलतः कर्नाटक क्षेत्र (चालुक्य प्रभाव क्षेत्र) से आए सैनिक सम्राट थे, जिन्होंने पूर्वोत्तर भारत में अपनी शक्ति स्थापित की और सिमरांवगढ़ (वर्तमान नेपाल-भारत सीमा पर) को अपनी राजधानी बनाया
नन्यदेव (1097–1147 ई.): साम्राज्य संस्थापक और संगीत शास्त्रज्ञ। इन्होंने संगीत ग्रन्थ 'सरस्वतीहृदयालंकार' की रचना गंगदेव एवं नरसिंहदेव: प्रशासनिक सुधार और राज्य विस्तार। रामसिंहदेव: न्याय प्रणाली और धर्मशास्त्र का सुदृढ़ीकरण।।हरिसिंहदेव (1295–1324 ई.): कर्नाट वंश के अंतिम और सबसे प्रसिद्ध शासक। इन्हीं के शासनकाल में मिथिला में सामाजिक क्रांति के रूप में 'पंजी प्रबंध' की शुरुआत हुई। 1324 ई. में दिल्ली के सुल्तान गियासुद्दीन तुगलक ने बंगाल अभियान से लौटते समय सिमरांवगढ़ पर आक्रमण कर दिया। राजा हरिसिंहदेव को नेपाल की पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ी, जिससे कर्नाट वंश का प्रत्यक्ष शासन समाप्त हो गया।
ओइनवार राजवंश (1325 ई. – 1526 ई.)।तुगलक आक्रमण के पश्चात मिथिला में उत्पन्न राजनीतिक शून्यता को भरते हुए ओइनवार राजवंश (काश्यप गोत्रीय मैथिल ब्राह्मण राजवंश) सत्ता में आया। इस वंश के संस्थापक कामेश्वर ठाकुर (ओइनी गाँव के निवासी) थे, जिन्हें फिरोज़ शाह तुगलक से मिथिला का शासन प्राप्त हुआ।
राजा देवसिंह एवं महाराजा शिवसिंह: ओइनवार वंश के सबसे प्रतिष्ठित शासक। महाराजा शिवसिंह महाकवि विद्यापति के परम मित्र और आश्रयदाता थे। महारानी विश्वास देवी: शिवसिंह के पश्चात शासन संभालने वाली विदुषी महारानी, जिन्होंने स्थापत्य और साहित्य को प्रोत्साहन।
मिथिला की पंजी प्रबंध व्यवस्था विश्व की सबसे प्राचीन और व्यवस्थित हस्तलिखित वंशावली प्रणालियों में से एक है। इसकी औपचारिक स्थापना 1326 ई. (1248 शक संवत) में कर्नाट नरेश हरिसिंहदेव के आदेशानुसार पंडितों के सम्मेलन में हुई थी
वैवाहिक संबंधों में आनुवंशिक दोष और रक्त-संबंधी जटिलताओं को रोकने के लिए पितृपक्ष से 7 पीढ़ी और मातृपक्ष से 5 पीढ़ी तक के संबंधों को जाँचा जाता है। पंजीकार वंशावली के संरक्षण के लिए अधिकृत विद्वान, जो ताड़पत्रों और पत्रों पर हर परिवार की कई पीढ़ियों का रिकॉर्ड रखते हैं। सिद्धांत पत्र: विवाह से पूर्व पंजीकार द्वारा दोनों पक्षों की वंशावली का मिलान कर 'अधिकार पत्र' या 'सिद्धांत पत्र' जारी किया जाता है, जिसके बिना विवाह वैध नहीं माना जाता।। कला, साहित्य और दर्शन का स्वर्णिम युग का कर्नाट और ओइनवार काल को मिथिला के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का युग कहा जाता है: साहित्यिक रचनाएँ: ज्योतिरीश्वर ठाकुर का 'वर्ण रत्नाकर' (मैथिली का प्रथम गद्य ग्रंथ) और महाकवि विद्यापति की 'पदावली', 'कीर्तिलता' एवं 'कीर्तिपताका'। नव्य-न्याय का पुनर्जागरण: गंगेश उपाध्याय ने 'तत्त्वचिंतामणि' की रचना कर मिथिला को भारतीय दर्शन और तर्कशास्त्र का सिरमौर बनाया।लोक कला एवं चित्रकला: घरों की दीवारों पर कोहबर और गोधना चित्रकला तथा आंगन में 'अरिपण' की परंपरा इसी काल में परिमार्जित हुई।
संदर्भ एवं ग्रंथ सूची - इतिहास व राजनीति राजनीति रत्नाकर ,गद्य साहित्य वर्ण रत्नाकर ज्योतिरीश्वर ठाकुर
काव्य व भक्ति साहित्य पदावली, पुरुष परीक्षा विद्यापति ठाकुर ,न्याय दर्शन तत्त्वचिंतामणि गंगेश उपाध्याय
स्मृति व धर्मशास्त्र विवाद चिंतामणि वाचस्पति मिश्रकरपी , अरवल , बिहार 804419
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