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"जीवन का ताना-बाना"

"जीवन का ताना-बाना"

पंकज शर्मा
वस्त्र का सौंदर्य किसी एक धागे की सामर्थ्य में नहीं, बल्कि असंख्य तंतुओं के परस्पर जुड़ने में निहित होता है। जीवन भी ऐसा ही एक विराट ताना-बाना है—हमारे संबंध, संघर्ष, स्मृतियाँ, विफलताएँ एवं अनुभव इसके विविध रंग हैं। कोई धागा अकेला सम्पूर्ण नहीं, किंतु प्रत्येक की अपनी अपरिहार्य भूमिका है। इसलिए अपने जीवन में आए लोगों एवं परिस्थितियों को केवल सुख-दुःख के तराजू पर नहीं, बल्कि उस व्यापक बुनावट के संदर्भ में देखना चाहिए, जो हमें भीतर से गढ़ती है।


मनुष्य की वास्तविक शक्ति आत्मनिर्भर होने में नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व की गरिमा समझने में है। कुछ लोग हमें थामते हैं, कुछ तोड़ते हैं, एवं कुछ टूटकर हमें जोड़ना सिखा जाते हैं। अतः संबंधों को बोझ नहीं, जीवन के तंतुओं की तरह स्वीकार करें। क्योंकि अंततः हमारी पहचान किसी एक उपलब्धि से नहीं, बल्कि उन अनगिनत स्पर्शों, संघर्षों एवं आत्मीयताओं से बुनी होती है, जिनसे हमारा अस्तित्व अर्थ पाता है।


. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) 
 पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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