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श्रावण द्वितीय सोमवार, सर्वत्र शिवत्व की बहार

श्रावण द्वितीय सोमवार, सर्वत्र शिवत्व की बहार

कुमार महेंद्र
कण-कण में निर्झर शिव-भक्ति,
जन-जन शिवालय की ओर।
प्रणय-पुलकित हृदय-सरोवर,
जीवन में नव मंगल-भोर।
मेघ-मुग्ध धरा हरित यौवन,
इंद्र-वृष्टि की कृपा अपार।
श्रावण द्वितीय सोमवार, सर्वत्र शिवत्व की बहार।।


रज-रज में शिवत्व-स्पंदन,
रग-रग में उपासना-भाव।
विधिवत् शिवलिंग-अभिषेक से,
पावन हो जीवन की नाव।
भजन-कीर्तन की मधुर तरंगें,
गूँजे नभ में जय-जयकार।
श्रावण द्वितीय सोमवार, सर्वत्र शिवत्व की बहार।।


घट-घट आस्था-ज्योति प्रज्वलित,
जागे अंतर्मन का प्रकाश।
आचार-विचार बने शुभ-सात्त्विक,
मन में पल्लवित हो विश्वास।
मंदिर-मंदिर शंभु-स्मरण हो,
गूँजे मंत्रों की झंकार।
श्रावण द्वितीय सोमवार, सर्वत्र शिवत्व की बहार।।


अद्य द्वितीय सोमवार अद्भुत,
कामिका एकादशी-पारण योग।
हरि-हर साधना का पुण्य अवसर,
दिव्य बने जीवन का संयोग।
बुधादित्य-वज्र सिद्धि-संयोग,
बहे अविरल श्रद्धा की धार।
श्रावण द्वितीय सोमवार, सर्वत्र शिवत्व की बहार।।


काँवड़िये जप-तप में रत हैं,
हर-हर महादेव का घोष।
गंगाजल लेकर शिव-चरणों में,
अर्पित करते श्रद्धा-भाव।
नीलकंठ से माँगें जगजन,
सुख-समृद्धि का शुभ उपहार।
श्रावण द्वितीय सोमवार, सर्वत्र शिवत्व की बहार।।


तन में सावन, मन में सावन,
शिवमय हो संसार समस्त।
अंतर से जब शिव को साधें,
जीवन हो पावन, निर्मल, प्रशस्त।
भक्ति बने जीवन की शक्ति,
हर हृदय में शिव का विस्तार।
श्रावण द्वितीय सोमवार, सर्वत्र शिवत्व की बहार।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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