"ठहरना सीख ले"
पंकज शर्मादौड़ता जा रहा हूँ,
किस ओर—
यह भी नहीं जानता।
पाया बहुत कुछ,
पर भीतर
कुछ छूटता रहा।
जिसे पाने निकला था,
वह मिला भी—
तो क्या मिला?
हर उपलब्धि के पीछे
एक रिक्तता
क्यों खड़ी मिली?
संसार कहता रहा—
चलते रहो,
समय रुकता नहीं।
पर मन पूछता है—
हर गति
क्या जीवन है?
आज ठहरकर देखूँ,
बाहर का शोर
भीतर उतरता है।
और मौन—
मुझसे ही
प्रश्न करता है।
जिसे खोजता रहा,
वह सत्य था,
या मेरी ही छाया?
ईश्वर, शून्य
या केवल मैं—
कह नहीं सकता।
इसलिए ठहरता हूँ।
कोई उत्तर नहीं चाहिए।
बस इतना—
‘मैं’ कुछ देर
अपने साथ रहे।
शायद यही
यात्रा की शुरुआत है।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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