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"दृष्टि का परिवर्तन"

"दृष्टि का परिवर्तन"

पंकज शर्मा
बाहरी परिस्थितियाँ हमारे जीवन को स्पर्श अवश्य करती हैं, किंतु वे हमारे अंतर्मन में दुःख का आकार स्वयं निर्धारित नहीं करतीं। एक ही घटना किसी के लिए पराजय हो सकती है, तो किसी दूसरे के लिए आत्मबोध का द्वार। वस्तुतः पीड़ा घटना में कम और उसके प्रति हमारी मानसिक व्याख्या में अधिक जन्म लेती है। हम परिस्थितियों को बदल न सकें, फिर भी उनके अर्थ को पुनः परिभाषित करने की स्वतंत्रता हमारे पास रहती है।

जीवन की परिपक्वता इसी बोध से आरंभ होती है कि प्रत्येक परिस्थिति के सम्मुख हमारी प्रतिक्रिया भी एक चुनाव है। जब हम बाहरी घटनाओं से अपना आंतरिक संतुलन वापस माँगना छोड़ देते हैं, तब मन धीरे-धीरे स्वतंत्र होने लगता है। दृष्टि बदलते ही वही संघर्ष साधना बन सकता है, वही विफलता अनुभव एवं वही पीड़ा आत्मबोध। परिस्थितियों पर विजय से बड़ी उपलब्धि है—अपने मन की व्याख्याओं पर अधिकार।

. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) 
पंकज शर्मा
(कमल सनातनी)
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