चंपारण के नायक पंडित राजकुमार शुक्ल और महात्मा गांधी
सत्येन्द्र कुमार पाठक
पंडित राजकुमार शुक्ल का जन्म *23 अगस्त 1875* को बिहार के *पश्चिमी चंपारण जिले के सतवरिया/सातवरिया गांव* में हुआ था। वे बेतिया के समीप स्थित सातवरिया के ब्राह्मण परिवार से थे। पिता का नाम कोलाहल शुक्ल* और माता का नाम *केवल देवी* था। एक साधारण किसान होते हुए भी उनमें अन्याय के विरुद्ध लड़ने का अद्भुत साहस था। उनका निधन *20 मई 1929 को हुआ।
19वीं-20वीं सदी में चंपारण के किसान अंग्रेज नीलहों के अत्याचार से त्रस्त थे। अंग्रेज किसानों को जबरन अपनी जमीन के 3 कट्ठा प्रति बीघा* पर नील की खेती करने को मजबूर करते थे। इसे *"तिनकठिया प्रथा"* कहा जाता था। इसके बदले किसानों को बहुत कम दाम मिलता था। विरोध करने पर मार-पीट, जुर्माना और बेदखली आम थी।।इसी शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वाले थे पंडित राजकुमार शुक्ल।।किसानों को संगठित करना*: उन्होंने गांव-गांव जाकर किसानों की दुर्दशा को समझा और उन्हें एकजुट किया। *गांधी जी से भेंट*: दिसंबर 1916 में लखनऊ में हुए कांग्रेस अधिवेशन में वे महात्मा गांधी से मिले। उन्होंने गांधी जी के पैर पकड़कर विनती की - "बापू, आप एक बार चंपारण चलकर किसानों का दुख अपनी आँखों से देखिए।" *गांधी को चंपारण लाना*: राजकुमार शुक्ल की जिद और सत्यनिष्ठा के कारण गांधी जी 10 अप्रैल 1917 को चंपारण आए। यहीं से भारत का पहला सफल *'चंपारण सत्याग्रह'* शुरू हुआ।।इस आंदोलन की सफलता के बाद ही देश ने गांधी जी को *"महात्मा"* की उपाधि दी। राजकुमार शुक्ल की दृढ़ता ही इस आंदोलन की नींव थी।
पंडित राजकुमार शुक्ल कोई बड़े नेता या वकील नहीं थे। वे एक किसान थे, लेकिन उनकी जिद ने इतिहास बदल दिया। वे निर्भीक, सत्यवादी और जनसेवी थे। उन्होंने साबित किया कि एक आम आदमी भी अगर संकल्पित हो तो बड़े से बड़े आंदोलन की चिंगारी जला सकता है।।चंपारण सत्याग्रह के बाद देश भर में सत्याग्रह की लहर चली और यही आगे चलकर असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन की प्रेरणा बना। आजादी के बाद बिहार सरकार और भारत सरकार ने उनके योगदान को सराहा। चंपारण में आज भी उनकी जयंती *23 अगस्त और पुण्यतिथि 20 मई को श्रद्धा से मनाई जाती है। वे बिहार के उन अमिट हस्ताक्षरों में से एक हैं जिन्होंने "जिद" से "आजादी" की राह खोली।।पंडित राजकुमार शुक्ल हमें यह सिखाते हैं कि सच्चा नेतृत्व पद से नहीं, पीड़ा को समझने और उसके लिए आवाज उठाने से आता है। वे चंपारण की मिट्टी के सपूत थे, जिन्होंने गांधी को बुलाकर भारत की आजादी की पहली जीत लिखवाई।।भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास वीरों, क्रांतिकारियों और त्यागियों की गाथाओं से भरा है। लेकिन कुछ नाम ऐसे होते हैं जो इतिहास के पन्नों में बहुत छोटे अक्षरों में लिखे जाते हैं, जबकि उनका योगदान बहुत बड़ा होता है। *पंडित राजकुमार शुक्ल* उन्हीं अनसुने नायकों में से एक हैं। वे न तो बड़े वकील थे, न कोई प्रसिद्ध नेता। वे चंपारण की मिट्टी के एक साधारण किसान थे। लेकिन उनकी एक "जिद" ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा बदल दी।।पंडित राजकुमार शुक्ल का जन्म *23 अगस्त 1875* को बिहार के *पश्चिमी चंपारण जिले के सतवरिया गांव* में हुआ था। यह गांव बेतिया के पास स्थित है। उनके पिता *कोलाहल शुक्ल* और माता *केवल देवी* एक सम्मानित ब्राह्मण परिवार से थे।
उनका बचपन अंग्रेजों के अत्याचार और किसानों की गरीबी को देखते-देखते बीता। उस समय चंपारण में नील की खेती के नाम पर किसानों का भीषण शोषण हो रहा था। इसी माहौल ने राजकुमार शुक्ल के मन में अन्याय के खिलाफ चेतना जगा दी। पढ़े-लिखे न होने के बावजूद वे स्वभाव से जिज्ञासु, सत्यनिष्ठ और निर्भीक थे।
उस समय अंग्रेज नीलहा साहूकार चंपारण के किसानों से एक समझौता कराते थे जिसे *"तिनकठिया प्रथा"* कहा जाता था। इसके तहत हर किसान को अपनी जमीन के *3 कट्ठा प्रति बीघा* हिस्से पर अनिवार्य रूप से नील की खेती करनी पड़ती थी। बदले में उसे बहुत कम पैसा दिया जाता था।
यदि कोई किसान मना करता तो उस पर भारी जुर्माना लगता, मार-पीट होती और जमीन छीन ली जाती। पुलिस और कचहरी सब अंग्रेजों के इशारे पर चलते थे। किसान भय और कर्ज के बोझ तले दबे हुए थे। भूख, बीमारी और अपमान उनकी नियति बन चुकी थी।इसी नरक से बाहर निकलने के लिए चंपारण को एक आवाज की जरूरत थी। और वह आवाज बने राजकुमार शुक्ल।।दिसंबर 1916 में कांग्रेस का अधिवेशन लखनऊ में हुआ। पंडित राजकुमार शुक्ल वहां पहुंचे। उनका उद्देश्य सिर्फ अधिवेशन में शामिल होना नहीं था। वे वहां *महात्मा गांधी* से मिलना चाहते थे, जिनके बारे में उन्होंने सुना था कि वे अन्याय के खिलाफ लड़ते हैं।
गांधी जी उस समय दक्षिण अफ्रीका से लौटकर भारत में सत्याग्रह के प्रयोग कर रहे थे। राजकुमार शुक्ल ने भीड़ में गांधी जी को ढूंढा और उनके पास पहुंचकर कहा - "बापू, आप चंपारण चलिए। वहां के किसानों की हालत बहुत खराब है।" गांधी जी ने कहा कि वे अभी व्यस्त हैं। लेकिन राजकुमार शुक्ल माने नहीं। वे लगातार गांधी जी के साथ-साथ चलते रहे। कानपुर, अहमदाबाद, कलकत्ता - जहां-जहां गांधी जी गए, राजकुमार शुक्ल भी उनके पीछे-पीछे गए। आखिरकार गांधी जी उनकी दृढ़ता और सच्चाई से प्रभावित हुए।
10 अप्रैल 1917 को महात्मा गांधी पटना होते हुए मोतिहारी पहुंचे। इस तरह *एक किसान की जिद ने गांधी को चंपारण बुला लिया*। इतिहास में इसे "एक आम आदमी द्वारा महात्मा को आमंत्रित करने" की सबसे बड़ी घटना माना जाता है।।चंपारण पहुंचकर गांधी जी ने गांव-गांव जाकर किसानों के बयान दर्ज किए। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश दिया, लेकिन गांधी जी जेल जाने को तैयार हो गए। अंततः सरकार को झुकना पड़ा।
जांच के बाद तिनकठिया प्रथा समाप्त कर दी गई। किसानों को 25% मुआवजा मिला। स्कूल, अस्पताल और स्वच्छता का काम शुरू हुआ। ।इस आंदोलन की सफलता के बाद ही रवींद्रनाथ टैगोर ने गांधी जी को *"महात्मा"* की उपाधि दी। और इस पूरी जीत की नींव रखने वाले थे पंडित राजकुमार शुक्ल। गांधी जी ने स्वयं कहा था - "राजकुमार शुक्ल ने मुझे चंपारण आने के लिए बाध्य कर दिया।"
व्यक्तित्व: सादगी, साहस और समर्पण राजकुमार शुक्ल का व्यक्तित्व असाधारण था। - *साहसी*: बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के वे अंग्रेजों से टकरा गए। - *सत्यनिष्ठ*: झूठ और समझौते को उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया। - *जनसेवी*: उन्होंने अपना घर-बार छोड़कर किसानों के लिए काम किया। - *दूरदर्शी*: उन्होंने समझ लिया था कि जब तक किसान संगठित नहीं होंगे, तब तक आजादी संभव नहीं है।
वे दिखावे से दूर रहने वाले व्यक्ति थे। आंदोलन के बाद भी वे प्रचार-प्रसार से दूर अपने गांव में ही रहे।
इस महान स्वतंत्रता सेनानी का निधन *20 मई 1929* को हुआ। उनके जाने के बाद देश ने उनकी शहादत को देर से पहचाना। आजादी के बाद बिहार सरकार ने चंपारण में उनकी स्मृति में स्मारक बनवाए। उनकी जयंती *23 अगस्त* और पुण्यतिथि *20 मई* को सरकारी और सामाजिक स्तर पर मनाई जाती है। विद्यालयों में उनके जीवन पर निबंध और भाषण प्रतियोगिताएं होती हैं।।पंडित राजकुमार शुक्ल का जीवन हमें 3 बड़ी सीख देता है: ।*एक व्यक्ति भी बदलाव ला सकता है*: उनके पास न पैसा था, न पद। सिर्फ संकल्प था। समस्या को जड़ से पकड़ो*: उन्होंने केवल शिकायत नहीं की, समाधान के लिए सही व्यक्ति तक पहुंचे। जिद सकारात्मक हो तो इतिहास बनती है*: उनकी जिद स्वार्थ के लिए नहीं, समाज के लिए थी।।आज जब हम गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, तब राजकुमार शुक्ल हमें याद दिलाते हैं कि संघर्ष की शुरुआत अपने घर और गांव से ही होती है।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हजारों नाम हैं। लेकिन पंडित राजकुमार शुक्ल का नाम सबसे अलग है। क्योंकि उन्होंने न लड़ाई लड़ी, न भाषण दिया। उन्होंने सिर्फ एक काम किया - *सही समय पर सही व्यक्ति को सही जगह ले आए*।।वे चंपारण के दीप थे, जिसकी लौ से गांधी का सत्याग्रह जला और उस लौ से पूरे देश में आजादी की मशाल। ऐसे अमर सेनानी को शत-शत नमन।।जब तक चंपारण की मिट्टी में कांस का फूल खिलेगा, तब तक राजकुमार शुक्ल की जिद की कहानी सुनाई जाएगी।"
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