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"जहाँ मौन स्वयं को सुनता है"

"जहाँ मौन स्वयं को सुनता है"

पंकज शर्मा
बहुत कहा मैंने।
शब्दों ने
अर्थों के नगर बसाए।
पर प्रत्येक उद्घोष
अपने ही प्रतिध्वनि-पाश में
लौट आया।
तब पहली बार
मौन ने
मेरा नाम नहीं पुकारा।


मैं भीतर उतरा।
न कोई प्रकाश मिला,
न कोई अँधेरा।
केवल स्मृतियों की
धीमी धूल थी,
जिस पर
मेरे ही पदचिह्न
मुझे अपरिचित लगे।
मैं किसे
अब तक स्वयं कहता रहा?


आसक्तियाँ
किसी वृक्ष की जड़ों-सी
अदृश्य थीं।
राग और द्वेष
एक ही श्वास के
दो छोर निकले।
जिसे बाँधना चाहा,
उसी ने
मुझे बाँधे रखा।


धीरे-धीरे
समय ने
अपना चेहरा उतार दिया।
नाम, संबंध, उपलब्धियाँ—
जल पर लिखे
क्षणिक अक्षर लगे।
जो मिट रहा था,
शायद वही
कभी स्थिर था ही नहीं।


तभी
एक निस्पंद उपस्थिति
मौन के अंतराल में
धड़कने लगी।
न वह दृश्य थी,
न अदृश्य।
न उसे जान सका,
न उससे अलग रह सका।
उसके समीप
सभी प्रश्न
अपनी आवश्यकता खो बैठे।


अब मौन
रिक्तता नहीं,
एक असीम अवगाहन है।
मैं उसे
सत्य कहने का साहस नहीं करता,
असत्य कहने का
अवकाश भी नहीं।
बस इतना जानता हूँ—
जब 'मैं' क्षीण होता है,
वही अनाम उपस्थिति
अपने आप
प्रकट होने लगती है;
और उसी क्षण
शांति,
किसी उपलब्धि की नहीं,
स्वभाव की तरह
मन में उतर आती है।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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