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लहरिया : सावन का परिधान

लहरिया : सावन का परिधान

कुमार महेंद्र
अंबर में उमड़ी काली घटाएँ,
महकी माटी की सोंधी गंध।
प्रकृति ने ओढ़ी धानी चुनरिया,
सावन करे अठखेलियाँ स्वच्छंद।
धानी, कसूमल, केसरिया आभा,
समेटे इंद्रधनुष की मुस्कान।
लहरिया, सावन का परिधान।।


बागों में झूले ऊँचे हिंडोले,
जागी पिया-मिलन की आस।
मेहँदी रची हथेलियों वाली,
छूने चलीं सखियाँ आकाश।
मोठड़े और लहरिए की छटा में,
गूँजे मारू-राग की तान।
लहरिया, सावन का परिधान।।


आई तीज, संग आया सिंजारा,
महकी घेवर-फेनी की मिठास।
अपनों का स्नेह, बड़ों का आशीष,
भर दे हर मन नव उल्लास।
रंग-बिरंगी थाली की शोभा,
बढ़ाए हर घर-आँगन का मान।
लहरिया, सावन का परिधान।।


खनक उठीं काँच की हरी चूड़ियाँ,
छम-छम गूँजी पायलिया।
घूमर की थाप पर थिरके तन-मन,
झूम उठी सावन की अल्हड़ गबरिया।
मरुधरा की गौरव-गाथा यह,
हर धड़कन, हर जन का अभिमान।
लहरिया, सावन का परिधान।।


सावन की हर भीगी बयार में,
महके संस्कृति का सम्मान।
लोक-रीत, प्रेम और अपनापन,
यही राजस्थान की पहचान।
रंग, उमंग और लोक-धरोहर,
युग-युग गूँजे इसकी आन, बान और शान।
लहरिया, सावन का परिधान।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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