पतझड़ तो बस एक परीक्षा है, नव पल्लव आने की
कुमार महेंद्र
सूखे पत्ते, मौन शाखाएँ,
क्यों मन में निराशा है?
ठहर ज़रा, ऐ थके पथिक,
यह जीवन की परीक्षा है।
ऋतु बदलेगी, रंग खिलेगा,
घड़ी निकट है मंज़िल पाने की।
पतझड़ तो बस एक परीक्षा है, नव पल्लव आने की।।
तपकर ही सोना निखरता है,
संकट ही राह दिखाता है।
जो सह लेता प्रखर धूप को,
शीतल छाया पाता है।
धुंध छँटेगी जीवन-पथ की,
बेला है अब दीप जलाने की।
पतझड़ तो बस एक परीक्षा है, नव पल्लव आने की।।
अंधियारे की कोख से ही तो,
भोर सुनहरी आती है।
हर पतझड़ की सूनी डाली,
मधुमासों को बुलाती है।
जड़ को सींच, अडिग रह पथ पर,
घड़ी यही फिर से मुस्काने की।
पतझड़ तो बस एक परीक्षा है, नव पल्लव आने की।।
आँधी आए, तूफ़ाँ गरजे,
दीप न अपने बुझने देना।
काँटों के बीचोंबीच भी तुम,
सपनों का गुलशन सजने देना।
धैर्य-दीप विश्वास सँजोकर,
रीत यही जीवन सजाने की।
पतझड़ तो बस एक परीक्षा है, नव पल्लव आने की।।
फिर कोयल कूकेगी वन में,
फिर महकेगा हर उपवन।
धरती के अधरों पर फिर से,
खिल उठेगा मधुरिम सावन।
हार नहीं है यह पतझड़ तो,
बेला है फिर फूल खिलाने की।
पतझड़ तो बस एक परीक्षा है, नव पल्लव आने की।।
जो आज उदासी ओढ़े हैं,
कल उनके आँगन फूलेंगे।
जो आज समय से लड़ते हैं,
कल उनके सपने झूलेंगे।
बस विश्वास हृदय में रखना,
घड़ी यही है परचम फहराने की।
पतझड़ तो बस एक परीक्षा है, नव पल्लव आने की।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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