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ये कैसा पानी

ये कैसा पानी

डॉ मधुछन्दा चक्रवर्ती
​बिनोता बस अड्डे पर अभी-अभी पहुँची ही थी कि उसे पता चला-भारी बारिश के कारण सिलचर जाने वाला मुख्य मार्ग पूरी तरह बंद हो चुका है। यह सुनते ही उसका दिल बैठ गया। बड़ी मुश्किल से उसे एक काम मिला था, जो उसके परिवार की आर्थिक तंगी को कुछ राहत दे सकता था।
​सिलचर में एक बुजुर्ग दंपति को पूरे दिन की देखभाल और घर के कामों में हाथ बंटाने के लिए किसी की जरूरत थी। यह काम दंपति के बेटे ने ही लगवाया था, जो नौकरी के सिलसिले में बाहर रहता था। बुजुर्ग माता-पिता के लिए घर का काम करने के साथ-साथ बूढ़ी महिला से बात करने और उनका अकेलापन दूर करने वाला कोई चाहिए था।
​बिनोता के घर में उसकी तीन बेटियाँ थीं, जो सरकारी स्कूल में पढ़ती थीं। पति माधव एक मिस्त्री का काम करते थे, लेकिन आमदनी इतनी कम थी कि घर का किराया और बच्चों की पढ़ाई का खर्च चलाना ही मुश्किल हो जाता था। बड़ी बेटी को इस साल मैट्रिक की परीक्षा देनी थी। ट्यूशन मास्टर की फीस बहुत ज्यादा थी, इसलिए पैसों की कमी के कारण वह उसे ट्यूशन नहीं भेज पाई थी। घर पर रहकर पढ़ाई के लिए जरूरी चीजें और मार्गदर्शन तो चाहिए ही था, इसलिए बिनोता ने माधव से बात की थी कि वह कहीं काम की तलाश करे।
​संयोग से, माधव सिलचर में उसी बुजुर्ग दंपति के घर पर दूसरी मंजिल बनवाने का काम कर रहा था। बुजुर्ग दंपति दिनभर अपने काम खुद करने की कोशिश में कराहते रहते थे। कभी पत्नी बीमार, तो कभी पति बीमार। बेटा और बहू छुट्टियों में आते तो उनकी खूब सेवा होती, लेकिन नौकरी के चलते उन्हें वापस लौटना पड़ता था। बच्चों की सलाह पर ही उन्होंने दूसरी मंजिल बनवाने की सोची थी ताकि एक किराएदार मिल जाए और बुजुर्ग अकेलेपन से बच सकें।
​माधव ने ही उनके बेटे से बात चलाई थी, और बेटे को यह विचार सही लगा कि कोई साथ रहेगा तो माता-पिता की चिंता कम हो जाएगी। बिनोता का काम बहुत साधारण था-सुबह आकर घर के काम संभालने थे, बुजुर्गों की दवाइयों का ध्यान रखना था और निर्देशानुसार छोटे-मोटे काम करने थे। इसके बदले में सुबह की चाय, दोपहर का खाना और तयशुदा तनख्वाह मिलने वाली थी। बिनोता को यह सौदा रास आया; बुजुर्गों की सेवा का पुण्य भी मिलता और घर में चार पैसे आ जाते।
​लेकिन, किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जिस दिन यह बात पक्की हुई, उसी शाम से ऐसी आंधी-बारिश शुरू हुई मानो आसमान अपना सारा क्रोध बरसा रहा हो।
​बिनोता का गाँव 'सागरपानी' अपने नाम के अनुरूप ही था। यहाँ बरसात के दिनों में नौकाएँ चलने का पुराना इतिहास रहा है, जिस कारण इस गाँव का नाम 'सागरपल्ली' से बदलकर 'सागरपानी' कर दिया गया था। तीन साल पहले सरकार ने सिलचर और अन्य राष्ट्रीय राजमार्गों से जोड़ने के लिए यहाँ एक सड़क जरूर बनवा दी थी, लेकिन सरकारी तंत्र के काम किसी से छिपे नहीं हैं। सड़क निर्माण की गुणवत्ता इतनी खराब थी कि बारिश आते ही आसपास के खेतों का पानी उस पर फैलने लगा।
​गाँव वालों ने सड़क के दोनों ओर बांस के बाड़े लगा रखे थे ताकि सड़क और खेत सुरक्षित रहें, लेकिन कुछ शरारती तत्वों ने रंजिश के चलते वे बाड़े कई जगहों से उखाड़ दिए। लगातार पानी के बहाव से सड़क और भी कमजोर हो गई थी।
​जिस दिन से आंधी-पानी शुरू हुआ था, सागरपानी के लोगों के दिल सहम गए थे। खेत पहले ही पानी में डूब चुके थे, और यदि सड़क भी बह जाती तो उनका जीना मुहाल हो जाता। जरूरत का सामान पास के बाजार से लाया जा सकता था, लेकिन बाजार तक जाने का यही एकमात्र रास्ता था। बरसों से गाँव वाले इसी रास्ते का इस्तेमाल करते आए थे। पहले जब सड़क नहीं थी, तब खेत डूबने पर नावें चलती थीं, लेकिन सड़क बन जाने के बाद नावों का चलना भी बंद हो गया था क्योंकि बीच में सड़क आ गई थी।
​आज वही बिनोता उसी पानी से घिरी सड़क के किनारे खड़ी थी। साथ में माधव भी था। दोनों इसी उलझन में थे कि अब सिलचर शहर जाएँ तो कैसे जाएँ, और यदि आज नहीं पहुँचे तो कहीं हाथ आया काम छूट न जाए।​दोनों की आँखों में निराशा के आँसू थे। ऊपर आसमान से बारिश की बूँदें अब भी बरस रही थीं, और पैरों के पास खड़ी सड़क मानों उनके संकट पर सवालिया निशान बनकर फैली हुई थी-"ये कैसा पानी है, जो जीवन को सींचने के बजाय हर बार उजाड़ देता है?"
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