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"विचारों की लपेटे में लपेटन

"विचारों की लपेटे में लपेटन

व्यंग
(बांकीपुर उपचुनाव)
रचना - डॉ. रवि शंकर मिश्र"राकेश"
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*भाग–3 : विचारों की चौपाल*
रात के लगभग आठ बज चुके थे।
दिन भर मरीजों की भीड़ रहने के बाद दवाखाने में अब एक अलग ही शांति उतर आई थी। औषधियों की अलमारियाँ व्यवस्थित हो चुकी थीं। डेगन रजिस्टर बंद कर चुका था। लपेटन चुपचाप पुड़ियों की गिनती कर रहा था, किंतु उसकी उँगलियाँ काम कर रही थीं और मन कहीं दूर भटक रहा था।
हबड़ी रसोई से चाय बनाकर लाई और सबके सामने रखती हुई बोली—
"लीजिए, अब दवा के बाद विचारों की भी चाय हो जाए।"
उसकी बात सुनकर सब हँस पड़े।
मैंने देखा, केवल लपेटन ही नहीं हँसा।
तभी बाहर से खदेरन आते दिखाई दिए। कंधे पर झोला, हाथ में एक डायरी और चेहरे पर वही सहज मुस्कान।
आते ही बोले—
"प्रणाम डॉक्टर साहब! लगता है आज चौपाल बिना मेरे ही आरंभ हो गई।"
"आइए कविजी," मैंने कुर्सी की ओर संकेत करते हुए कहा, "आज आपकी ही प्रतीक्षा थी।"
डेगन ने बात पकड़ ली।
"डॉक्टर साहब, आज कविता बाद में सुनिएगा। पहले इस लपेटन का इलाज कीजिए। पिछले पंद्रह दिनों से इसका चेहरा ऐसा हो गया है जैसे किसी ने मतदान की पूरी जिम्मेदारी इसी के कंधे पर रख दी हो।"
सब हँस पड़े।
लपेटन हल्का-सा मुस्कराया, फिर चुप हो गया।
गया बाबू ने चश्मा ठीक करते हुए कहा—
"डॉक्टर साहब, रोग पुराना हो जाए, उससे पहले निदान कर दीजिए।"
मैंने हँसते हुए कहा—
"निदान तो तभी होगा जब रोगी अपनी बीमारी बताए।"
कुछ क्षण तक सन्नाटा छाया रहा।
मैंने लपेटन की ओर देखते हुए कहा—
"देखो लपेटन, यहाँ कोई नेता नहीं बैठा है, न कोई पत्रकार। जो मन में है, निःसंकोच कहो।"
लपेटन ने एक गहरी साँस ली।
"डॉक्टर साहब... यही तो नहीं समझ पा रहा हूँ कि इस बार वोट किसे दूँ।"
डेगन तुरंत बोल पड़ा—
"बस! यही बीमारी है।"
हबड़ी ने मुस्कराकर कहा—
"इतनी-सी बात के लिए पंद्रह दिन से चेहरा लटकाए घूम रहे हो?"
लपेटन ने धीरे से उत्तर दिया—
"आप लोगों को छोटी बात लग सकती है, लेकिन मेरे लिए यह आसान नहीं है।"
खदेरन अब तक ध्यान से उसे देख रहे थे।
उन्होंने गंभीर स्वर में कहा—
"निर्णय कठिन होना अच्छी बात है। जो बिना सोचे निर्णय कर ले, वह मतदाता कम, अनुयायी अधिक होता है।"
लपेटन ने पहली बार उनकी ओर देखा।
शायद उसे लगा कि कोई उसके मन की भाषा समझ रहा है।
वह बोला—
"मैं कई दिनों से अलग-अलग लोगों को सुन रहा हूँ। एक कहता है—देश को मजबूत नेतृत्व चाहिए। दूसरा कहता है—पहले बिहार की चिंता करो। कोई विकास की बात करता है, कोई व्यवस्था बदलने की। हर किसी की बात सुनने पर लगता है कि वही ठीक कह रहा है।"
गया बाबू मुस्कराए।
"यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा है बेटा।"
डेगन बीच में ही बोल पड़ा—
"लेकिन इतना भी क्या सोचना? हम तो जिसको ठीक समझेंगे, उसी को वोट देंगे और घर आकर आराम से सो जाएँगे।"
खदेरन ने हँसते हुए कहा—
"डेगन भैया! यही अंतर है आपमें और लपेटन में। आप निर्णय पहले लेते हैं, तर्क बाद में खोजते हैं। यह पहले तर्क खोज रहा है, निर्णय बाद में करेगा।"
बरामदे में एक साथ ठहाका गूँज उठा।
डेगन भी हँस पड़ा।
"कविजी! बात तो ठीक कह दी आपने।"
मैं अब तक सबकी बातें ध्यान से सुन रहा था।
मैंने कहा—
"मनुष्य का विवेक भी बड़ी विचित्र वस्तु है। कभी-कभी वह हमें इतना सोचने पर विवश कर देता है कि निर्णय लेना ही कठिन हो जाता है।"
इतने में बाहर से दो और परिचित आ गए।
एक स्थानीय किराना दुकानदार थे, दूसरे पास के विद्यालय के शिक्षक।
दोनों कुर्सी खींचकर बैठ गए।
शिक्षक महोदय ने आते ही कहा—
"लगता है आज भी चुनाव की ही चर्चा चल रही है।"
डेगन ने उत्तर दिया—
"नहीं, आज चुनाव की नहीं; चुनाव में फँसे एक मतदाता की चर्चा चल रही है।"
सबकी दृष्टि फिर लपेटन पर टिक गई।
कुछ क्षण बाद खदेरन ने धीरे से पूछा—
"अच्छा लपेटन, इतना तो बताओ—तुम्हें सबसे अधिक उलझन किस बात की है?"
लपेटन ने धीरे-धीरे शब्द चुने।
"यही कि देश और प्रदेश—दोनों मेरे अपने हैं। यदि कोई राष्ट्रीय विषयों की बात करता है तो वह भी मुझे ठीक लगता है। यदि कोई बिहार की शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों, बेरोज़गारी और व्यवस्था की चर्चा करता है तो वह भी गलत नहीं लगता। मैं किसी के प्रभाव में नहीं आना चाहता, लेकिन किसी की बात को बिना सोचे नकार भी नहीं सकता।"
कमरे में फिर कुछ क्षणों का मौन छा गया।
मैंने अनुभव किया—
आज पहली बार लपेटन ने अपने मन का दरवाज़ा थोड़ा-सा खोला है।
लेकिन उसके भीतर अभी भी अनेक प्रश्न बंद पड़े हैं।
और प्रश्न जब भीतर बंद रह जाते हैं, तब वे उत्तरों से अधिक मनुष्य को थका देते हैं।
उस रात दवाखाने की चौपाल देर तक चलती रही।
चाय के कई दौर हुए, पर किसी ने किसी को समझाने का प्रयास नहीं किया।
सब केवल सुन रहे थे।
क्योंकि कभी-कभी सुन लेना ही सबसे बड़ी चिकित्सा होती है।
उधर लपेटन...
अब भी उसी कुर्सी पर बैठा था।
अंतर केवल इतना था कि अब वह अकेला नहीं था।
उसकी उलझन सबकी चर्चा बन चुकी थी।
और मुझे लगने लगा था—
अगली शाम यह चर्चा केवल विचारों तक सीमित नहीं रहेगी।
अब तर्कों का असली मुकाबला शुरू होगा।(क्रमशः...)
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