दोस्ती दिवस पर
डॉ अ कीर्ति वर्द्धनकहते हैं कि दोस्त पुराने चल जाते हैं,
हर मुश्किल में साथ निभाने आ जाते हैं।
रिश्ते- नाते धन- दौलत बेकार की बातें,
हर संकट में दोस्त खड़े दिख जाते हैं।
जैसे जैसे उम्र बढ़ी, सब दोस्त खो गये,
कुछ बूढ़े हो गये, कुछ शहर छोड़ गये।
कुछ अशक्त बीमार, वृद्धाश्रम में कुछ,
कुछ पर बच्चों के नियन्त्रण कड़े हो गये।
अर्थ से सम्पन्न बहुत, पर निर्धन देखे,
था बहुत कुछ पास, मगर रोते देखे।
बच्चे भी परेशान, देख उनकी आदत,
दोस्त उन्हें, कंजूसी का तमग़ा देते।
दुआ सलाम, हम सबसे ही करते रहते,
सक्षम को प्रणाम, शीश झुकाते रहते।
कभी स्वार्थ में गधे को हम बाप बताते,
दोस्त वही जो दर्पण बन साथ में रहते।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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