शिक्षा और राजनीति
©भारतका एक ब्राह्मण.
संजय कुमार मिश्र "अणु"
राजनीति की भी शिक्षा है और वह अनिवार्य है पर वर्तमान समय में हमारे देश और प्रदेश में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।हाँ कहने और दिखाने के लिए आज बडे-बड़े शैक्षणिक संस्थानों में इसका एक अलग संकाय जरूर बना दिया है।
हमारे समाज में राजनीति को भी शास्त्र की संज्ञा दी गई है।लेकिन दुर्भाग्य देखिए सबसे पहले स्वार्थ लोलुप लोग शास्त्र को एक साम्प्रदायिक शब्द कहकर सदा-सदा के लिए उसे हटा और मिटा दिए। सिर्फ राजनीति को ग्रहण किये और इसको आज इस अराजक स्थिति तक ले आये हैं।राजनीति राजनीति कहकर सिर्फ राजकाज तक अपना ध्यान केंद्रित रखा।नीति को मिटा दिया।कारण की नीति के रहते वे कुछ भी अनैतिक कर नहीं सकते थे। इसके लिए वे सब मिलकर धीरे-धीरे नीति को भी दरकिनार कर दिए। लोभ बस केवल राज करने तक इसको सीमित कर दिया।आज समाज के तथाकथित रहनुमाओं को केवल राज चाहिए वह भी बिना नीति के। यानि मनमानी तरीके का। शास्त्र और नीति से आजके नेताओं को कुछ लेनादेना नहीं है।बिना नीति और शास्त्र का यह मानवीय जीवन और समाज उच्छृंखल और उदंड हो जाता है।और उसके द्वारा लिए गये फैसले समाज देश और प्रदेश के लिए घातक होता है।बस यही कारण है कि आज की नीति हीन राजनीति अराजक और असंवेदनशील हो गई है।
राजनीति की शिक्षा अच्छी बात है पर शिक्षा में राजनीति बहुत बुरी बात है।आज शिक्षा के साथ केवल राजनीति ही नहीं की जा रही है बल्कि उसके साथ खेलवाड किया जा रहा है।आज के तथाकथित समाजसेवी लोग विद्यालय को समाजसेवा के नाम पर एक सुविधा केंद्र के रूप में विकसित कर तरह तरह के प्रयोग कर रहे हैं।
रही सही कसर देश प्रदेश की जो सरकार और उसके विभाग हैं वे सब पुरे कर रहे हैं।अपना अपना प्रयोग इसी प्रयोगशाला से सिद्ध करना चाहते है। तमाम तरह की नीतियां विद्यालय के कर्मचारी और बच्चों पर थोप रहे हैं। योजना चाहे जो हो उसमें बिना लाग लपेट के शिक्षक और शिक्षार्थी को गली-गली और सडको पर खडा कर दो।समाज देखेगा और फिर लाभ लेगा। हाय रे सरकार।हाय रे शिक्षा।हाय रे शिक्षक।तेरी ये दुर्दशा।कभी किसी ने इसकी कल्पना भी नहीं की होगी।जो आज देखने को मिल रहा है।
अभी जो शिक्षा की नीति बनाई और परोसी जा रही है वो कहीं से भी बच्चों और शिक्षकों के हित में नहीं है। सब अनैतिक और अव्यवहारिक है।शिक्षा का अर्थ हमें मानसिक शारीरिक और व्यवहारिक रूप से समुन्नत बनाने का रहा है।वह कहीं दिखती नहीं है।आप एक बौद्धिक वर्ग के प्रतिनिधि हैं।कोई मशीन नहीं है।कभी समय मिले तो आप मेरे इस विचार पर विचार जरूर किजिएगा।
मानता हूँ कि शिक्षक प्रथम दृष्टा एक कर्मचारी है। पर वो मात्र एक कर्मचारी नहीं है।है तो वह अन्य कर्मचारियों से भिन्न प्रकृति और प्रवृत्ति का कर्मचारी है।वह देश समाज का स्रष्टा है।शिक्षा और राजनीति दोनों ही शास्त्र सम्मत होना चाहिए।तभी वह सुफल प्रदाता सिद्ध होगा।दोनों समाज के दो ध्रुव है। दोनों की अपनी-अपनी विशेषता और नीति है।शास्त्र हीन नीति और नीति हीन शास्त्र दोनों हीं परित्यज है।
आज जो शिक्षा को लेकर जो राजनीति हो रही है न वो देश और प्रदेश को रसातल में ले जा रही है।इससे विनाश संभव है विकास नहीं।सरकार और समाज सिर्फ आंकड़ों का खेल खेल रही है।
कर्मचारी और पदाधिकारी रोज आंकड़े मांगते हैं।वो इस लिए की जब कभी कोई किसी तरह का प्रश्न करे तो अपने बचाव में इसे दिखाया जाय।
संसद और सदन में नियम बनता है घोषणाएं होती है और उसे पदाधिकारी लोग अपनी मर्जी से पारिभाषित कर क्रियान्वित करते हैं।
नेता विधानसभा में विद्यालय संचालन के लिए समय सारणी को लेकर जिक्र और फिक्र करता है पर उसका क्रियान्वयन हो पाता है।जब सभा और सदन की बात नहीं सुनी जा रही है तो फिर सडक की बात कौन सुने?
सडकें सुनी हैं। संसद और सभा मौन है। कोई भी जबाब देने को तैयार नहीं कि इसका उत्तरदायी आखिर कौन है। पदाधिकारी और कर्मचारी एक औपचारिक पत्र तक निर्गत नहीं करता है जब तक की चढावा न चढे।कोई आरोप न मढे।
राजनीति किजिए और खुब किजिए।राजनीति समाज के लिए ही बना है। पर मनुष्य और शिक्षा के लिए इसका प्रयोग मत किजिए।इस बात का विशेष ध्यान रखिये।नहीं तो इसका दुष्परिणाम असह्य होगा।जब नैतिकता ही नहीं है आपके पास तो फिर और क्या है?
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