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अप्सराएँ भी लजाती, रानी पद्मिनी सौंदर्य के सामने

अप्सराएँ भी लजाती, रानी पद्मिनी सौंदर्य के सामने

कुमार महेंद्र
चित्तौड़ धरा की दिव्य विभूति,
भारत-माता की शान थीं।
रूप, शील, साहस, त्यागमयी,
नारी-गौरव की पहचान थीं।
था रूप ऐसा अलौकिक,
देवगण भी लगे निहारने।
अप्सराएँ भी लजाती, रानी पद्मिनी सौंदर्य के सामने।।


कमल-नयनों में करुणा थी,
अधरों पर मधुर मुस्कान।
मुखमंडल की दिव्य प्रभा से,
मिट जाती हर एक थकान।
रंभा, उर्वशी, मेनका भी,
आतुर थीं शीश झुकाने।
अप्सराएँ भी लजाती, रानी पद्मिनी सौंदर्य के सामने।।


चलतीं तो मंद समीर ठहरता,
कलियाँ हँसकर खिल जाती थीं।
रवि की स्वर्णिम प्रथम किरण भी,
उन पर आकर इठलाती थीं।
चाँद-सितारे नत हो जाते,
उसकी छवि पर रीझ जाने।
अप्सराएँ भी लजाती, रानी पद्मिनी सौंदर्य के सामने।।


किन्तु रूप ही उनका परिचय,
ऐसा सीमित मान न था।
अंतर में जलता राष्ट्रधर्म का,
अमर, अखंडित ज्ञान था।
प्राण समर्पित कर दिए उन्होंने,
मातृभूमि का मान बचाने।
अप्सराएँ भी लजाती, रानी पद्मिनी सौंदर्य के सामने।।


जौहर-ज्वाला बनी तपस्या,
स्वाभिमान का दीप जला।
राजपूती आन-बान की खातिर,
हँसते-हँसते तन भी जला।
युग-युग तक इतिहास रहेगा,
उनकी अमर कथा सुनाने।
अप्सराएँ भी लजाती, रानी पद्मिनी सौंदर्य के सामने।।


जब-जब नारी-शक्ति की गाथा,
भारत-भू पर गाई जाएगी।
रानी पद्मिनी की गौरव-गाथा,
स्वर्णाक्षरों में लिखी जाएगी।
हर बेटी प्रेरणा पाएगी,
अन्यायों को ललकारने।
अप्सराएँ भी लजाती, रानी पद्मिनी सौंदर्य के सामने।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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