शालग्राम पूजन, द्वादशाक्षर मन्त्र भक्ति का दिव्य मार्ग
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय सनातन परंपरा में स्कंद पुराण एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं भव्य ग्रंथ है। यह पुराण न केवल देव-उपासना और कर्मकांडों का विस्तृत ज्ञान प्रदान करता है, बल्कि भक्ति, मन्त्र-जप और आध्यात्मिक मुक्ति के सरल मार्गों का दर्शन भी कराता है। स्कंद पुराण के एक पावन प्रसंग में भगवान श्रीहरि विष्णु के शालग्राम स्वरूप की पूजा, भगवान वासुदेव के 'द्वादशाक्षर मन्त्र' तथा दो अक्षरों वाले पवित्र 'राम' नाम की अनन्त महिमा का वर्णन किया गया है।
शालग्राम शिला एवं नर्मदेश्वर: महर्षि गालव के अनुसार, इस पृथ्वी पर भगवान विष्णु और भगवान शिव स्वयं-भू (अपने आप प्रकट) रूप में विराजमान हैं। भगवान विष्णु का शालग्राम स्वरूप: नेपाल स्थित पवित्र गण्डकी नदी के जल में श्रीहरि विष्णु शालग्राम शिला के रूप में प्रकट होते हैं। भगवान शिव का नर्मदेश्वर स्वरूप: नर्मदा नदी में देवाधिदेव महादेव 'नर्मदेश्वर' शिवलिंग के रूप में उत्पन्न होते हैं। ये दोनों स्वरूप कृत्रिम (मानव-निर्मित) नहीं हैं, बल्कि साक्षात् ईश्वर के प्रत्यक्ष प्राकटीकरण हैं। जहाँ नर्मदेश्वर शिव सदा एक रूप में रहते हैं, वहीं शालग्राम शिला में भगवान विष्णु चौबीस (२४) विभिन्न भेदों व रूपों में व्याप्त रहते हैं। जहाँ भगवान शालग्राम का पूजन होता है, वहाँ चारों ओर पाँच कोस (लगभग १५ किलोमीटर) तक का भूभाग अत्यंत पवित्र हो जाता है। उस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अमंगल या अशुभ नहीं होता। शालग्राम शिला का पूजन ही सबसे बड़ा तप, उत्तम सौभाग्य और मोक्ष का साधन है। चातुर्मास्य (चातुर्मास) के समय शालग्राम जी को फल, जल और नैवेद्य अर्पित करना विशेष फलदायी होता है।
पंच-दिव्य उपस्थिति: जिस स्थान पर निम्नलिखित पाँच वस्तुएँ एक साथ विद्यमान होती हैं, वहाँ लक्ष्मी, विजय, विष्णु और मुक्ति—ये चारों स्वतः निवास करते हैं: दक्षिणावर्त शंख, लक्ष्मीनारायण स्वरूप शालग्राम शिला ,तुलसी का पौधा या मंजरी ,कृष्णसार मृग , द्वारका की गोमती चक्र शिला है। पुराण में एक अत्यंत मनमोहक प्रसंग आता है, जब माता पार्वती भगवान शिव से पूछती हैं: "हे महेश्वर! आप तो स्वयं सभी के स्वामी हैं, फिर भी आपके हाथ में सदैव रुद्राक्ष की माला रहती है और आप निरंतर किस मन्त्र का जप करते हैं?" इसके उत्तर में भगवान शिव 'द्वादशाक्षर मन्त्र' (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का गूढ़ रहस्य बताते हैं: वेदों का सार (प्रणव युक्त): 'ॐ' (अ, ऊ, म) से सम्बद्ध यह मन्त्र सम्पूर्ण वेदों का सार है। यह निर्मल, अमृततुल्य, कलातीत और करोड़ों ब्रह्मांडों का मूल बीज है। : ॐकार सहित इस १२ अक्षरों के मन्त्र का जप करने से यह मनुष्य के कोटि-कोटि जन्मों के पापों को उसी प्रकार जलाकर भस्म कर देता है, जैसे जंगलों की आग (दावानल) सूखी लकड़ी को जला देती है।
चातुर्मास्य में इस मन्त्र का ध्यान व जप करने से मनोवांछित फल और सनातन ब्रह्मपद की प्राप्ति होती है। इस मन्त्र के जप से मनुष्य पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है। स्त्रियों और शूद्रों के लिए इसे प्रणव (ॐ) से रहित जप करने का विधान बताया गया है। वे विष्णु-चिंतन और भक्ति से ही सिद्ध हो जाते हैं।
भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं कि वे विष्णु सहस्रनाम (विष्णु जी के १,००० नाम) के स्थान पर केवल 'राम' नाम का निरंतर जप करते हैं। "राम" = सर्व पाप नाशक + सर्व मनोरथ सिद्धिकारक।जो परमात्मा इस चराचर जगत् के प्रत्येक कण और प्राणी में 'रम' रहा है (विद्यमान है), वही 'राम' है।: केवल एक बार 'राम' नाम का श्रद्धा से उच्चारण करने पर श्रीविष्णु सहस्रनाम (हज़ार नामों) के पाठ के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।: मनुष्य चलते, बैठते, खड़े होते या सोते समय भी यदि 'राम' नाम का कीर्तन करता है, तो वह इस लोक में सुख भोगता है और अंत में भगवान विष्णु का पार्षद बनता है। 1 कैसा यह दो अक्षरों का मन्त्रराज युद्ध में विजय प्रदान करता है, राजभय तथा शारीरिक-मानसिक व्याधियों (रोगों) का अंत करता है। जो मनुष्य राम नाम की शरण ले चुका है, उसे यमलोक की यातनाएँ कभी नहीं भोगनी पड़तीं।स्कंद पुराण का यह प्रसंग हमें यह संदेश देता है कि ईश्वर को प्राप्त करने और जीवन के कष्टों से मुक्ति पाने के लिए जटिल साधनाओं की आवश्यकता नहीं है। शालग्राम जी के रूप में साक्षात् श्रीहरि की सेवा, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का ध्यान, और सर्वसुलभ 'राम' नाम का निरंतर कीर्तन जीवन को पावन और मोक्षप्रद बनाने के लिए पर्याप्त है।
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