धर्म, समाज, राजनीति और शिक्षा की वर्तमान दिशा पर हुआ गंभीर वैचारिक मंथन

- गया में भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच की विशेष परिचर्चा, सैकड़ों लोगों ने ग्रहण की भारतीय जन क्रांतिदल की सदस्यता
गया। भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच के तत्वावधान में गया स्थित डॉक्टर विवेकानंद पथ, गोलबगीचा में धर्म, समाज, राजनीति और शिक्षा की वर्तमान परिस्थितियों पर एक महत्वपूर्ण वैचारिक परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विवेकानंद मिश्र के आवास पर उनकी अध्यक्षता में संपन्न हुआ। परिचर्चा में बिहार के प्रख्यात शिक्षाविद् मार्कण्डेय शारदे, कमलेश पुण्यार्क गुरुजी, आचार्य सच्चिदानंद मिश्र, भारतीय जन क्रांतिदल के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. राकेश दत्त मिश्र, प्रोफेसर (डॉ.) गीता पासवान सहित अनेक विद्वानों, शिक्षाविदों, समाजसेवियों एवं प्रबुद्ध नागरिकों ने सहभागिता की।
कार्यक्रम का उद्देश्य भारत की वर्तमान धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक परिस्थितियों का गंभीर विश्लेषण करते हुए राष्ट्र के समक्ष उपस्थित चुनौतियों और उनके समाधान पर सार्थक संवाद स्थापित करना था। परिचर्चा के दौरान वक्ताओं ने राष्ट्र निर्माण, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक संरक्षण, नैतिक मूल्यों, शिक्षा व्यवस्था तथा राजनीतिक चेतना जैसे विविध विषयों पर अपने विचार रखे।

मानसिक और वैचारिक स्वतंत्रता की आवश्यकता पर बल
वक्ताओं ने कहा कि भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त हुए कई दशक बीत चुके हैं, लेकिन मानसिक और वैचारिक स्वतंत्रता की दिशा में अभी भी व्यापक कार्य किए जाने की आवश्यकता है। विद्वानों का मत था कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी सनातन संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना, नैतिक मूल्यों और सामाजिक एकता में निहित है। उन्होंने कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक ऐसी प्राचीन सभ्यता है जिसकी ज्ञान परंपरा ने विश्व मानवता को दिशा प्रदान की है।
सामाजिक समरसता और वर्ण व्यवस्था के मूल स्वरूप पर चर्चा
परिचर्चा में सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था के संदर्भ में वर्ण व्यवस्था के मूल स्वरूप पर भी विचार-विमर्श हुआ। वक्ताओं ने कहा कि प्राचीन भारतीय व्यवस्था में वर्ण का आधार जन्म नहीं, बल्कि व्यक्ति के गुण, कर्म और योग्यता थे। कालांतर में सामाजिक विकृतियों तथा औपनिवेशिक नीतियों के प्रभाव से समाज में विभाजन और दूरियां बढ़ीं। विद्वानों ने समाज में समरसता, परस्पर सम्मान और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया।

ब्राह्मणत्व को बताया ज्ञान और उत्तरदायित्व की अवधारणा
वक्ताओं ने कहा कि ब्राह्मणत्व केवल जन्म आधारित पहचान नहीं, बल्कि ज्ञान, तप, त्याग, सदाचार और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना का प्रतीक है। समाज में ज्ञान का प्रकाश फैलाना, संस्कृति और शास्त्रीय परंपराओं का संरक्षण करना तथा नई पीढ़ी को नैतिक दिशा प्रदान करना विद्वान एवं आचार्य वर्ग का दायित्व है। इसके लिए आत्ममंथन और अपने मूल कर्तव्यों के प्रति पुनः जागरूक होने की आवश्यकता बताई गई।
वर्तमान राजनीति पर व्यक्त की चिंता
परिचर्चा में वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गई। वक्ताओं ने कहा कि राजनीति में बढ़ता वोट बैंकवाद, जातिगत ध्रुवीकरण और व्यक्तिगत स्वार्थ राष्ट्र और समाज के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। राजनीति का मूल उद्देश्य समाज और राष्ट्र की सेवा होना चाहिए, किंतु जब राजनीतिक व्यवस्था समाज को जोड़ने के बजाय विभाजित करने का माध्यम बनने लगे तो राष्ट्र की सामूहिक शक्ति कमजोर होती है। वक्ताओं ने जागरूक नागरिकों और बुद्धिजीवियों से राष्ट्रहित, सामाजिक समरसता और नैतिक मूल्यों पर आधारित राजनीतिक चेतना विकसित करने का आह्वान किया।
गुरुकुल शिक्षा पद्धति को पुनर्स्थापित करने की मांग
परिचर्चा में शिक्षा व्यवस्था प्रमुख विषय के रूप में उभरी। आचार्य सच्चिदानंद मिश्र ने वर्तमान विद्यालय आधारित शिक्षा प्रणाली की सीमाओं की चर्चा करते हुए भारतीय गुरुकुल शिक्षा पद्धति को पुनः स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र, अनुशासन, विवेक, नैतिकता और जीवन मूल्यों का निर्माण होना चाहिए। गुरुकुल परंपरा में गुरु-शिष्य संबंध जीवन निर्माण का आधार था, जिसे पुनर्जीवित किए जाने की आवश्यकता है।

डॉ. विवेकानंद मिश्र ने भी गुरुकुल व्यवस्था के पक्ष में अपने विचार रखते हुए कहा कि भारतीय शिक्षा को अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा और आधुनिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। उन्होंने कहा कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में नैतिक शिक्षा, भारतीय संस्कृति, शास्त्रीय ज्ञान और चरित्र निर्माण की उपेक्षा चिंता का विषय है।
सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से करने का आह्वान
विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर (डॉ.) गीता पासवान ने कहा कि सामाजिक और राष्ट्रीय सुधार की शुरुआत प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से करनी होगी। केवल समस्याओं पर चर्चा करने से परिवर्तन संभव नहीं है। उन्होंने व्यक्तिगत उत्तरदायित्व, सामाजिक जागरूकता और सकारात्मक आचरण को राष्ट्र निर्माण का आधार बताया।
समाजसेवी कुमारी डिंपल ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्यों, सामाजिक दायित्वों और नैतिक मूल्यों के प्रति सजग होना चाहिए। समाज में सकारात्मक परिवर्तन तभी संभव है जब व्यक्ति स्वयं अपने आचरण में सुधार लाए।
वर्तमान शिक्षा और सामाजिक मूल्यों पर डॉ. विवेकानंद मिश्र का वक्तव्य
अपने अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. विवेकानंद मिश्र ने कहा कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली ने विवेक और मूल्यबोध को कमजोर किया है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का मूल उद्देश्य चरित्र निर्माण और समाजोपयोगी नागरिक तैयार करना था, जो आज धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का उद्घोष कभी भारतीय समाज के व्यवहार का आधार था, लेकिन आज उपभोक्तावाद और स्वार्थपरक जीवनशैली के कारण सामाजिक संवेदनशीलता कमजोर पड़ती जा रही है। उन्होंने बढ़ते नैतिक पतन और अनुशासनहीनता को राष्ट्र के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया।
सैकड़ों लोगों ने ग्रहण की भारतीय जन क्रांतिदल की सदस्यता
कार्यक्रम के अंत में पंडित बाल मुकुंद मिश्रा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। वहीं भारतीय जन क्रांतिदल के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. राकेश दत्त मिश्र के आह्वान पर बड़ी संख्या में उपस्थित लोगों ने पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। इस दौरान सैकड़ों लोगों ने राष्ट्र निर्माण, सामाजिक जागरूकता और जनहित के कार्यों में सक्रिय भागीदारी का संकल्प लिया।
बड़ी संख्या में उपस्थित रहे प्रबुद्धजन
परिचर्चा में प्रमुख रूप से आचार्य कुमुद रंजन मिश्रा, अच्युत अनंत, प्रेरणा मराठे, डॉ. दिनेश कुमार सिंह, डॉ. रविंद्र कुमार, वीणा कुमारी, फूल कुमारी, रंजन पांडेय, अमरनाथ मिश्रा, किरण पाठक, पुष्प राज, नीलम कुमारी, विश्वजीत चक्रवर्ती, पार्वती देवी, मृदुला मिश्रा, शीतल चौबे, विनयकांत मिश्र, साहिल चौबे, जयनेंद्र कुमार, दिलीप कुमार, नीरज वर्मा, अभिजीत बनर्जी, मनीष मिश्रा, दीपक पाठक, रणजीत राज, शिवजी कुमार, रामकेवल सिंह, चंद्रभूषण मिश्र, रूबी कुमारी, सुनीता देवी, पुष्पा देवी, अजय मिश्र, अमरनाथ पांडेय, प्रोफेसर अशोक कुमार तथा सुनील कुमार सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
कार्यक्रम राष्ट्र, धर्म, समाज, राजनीति और शिक्षा के विविध आयामों पर गंभीर चिंतन और रचनात्मक संवाद का महत्वपूर्ण मंच सिद्ध हुआ।
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