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जब विद्वान के अहंकार ने भगवान के हृदय को घायल कर दिया

जब विद्वान के अहंकार ने भगवान के हृदय को घायल कर दिया

लेखक आनंद हठिला

  • ज्ञान का वास्तविक अर्थ विनम्रता है, और भक्ति का सार है:-ईश्वर की असीम करुणा को स्वीकार करना

एक शांत, सुरम्य और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण गाँव के अंतिम छोर पर एक विशाल नीम का वृक्ष था। उसकी शीतल छाया में एक प्रकांड विद्वान ब्राह्मण का निवास था। वे चारों वेदों, उपनिषदों और अनेक शास्त्रों के ज्ञाता थे। धर्मग्रंथों का उन्हें गहरा ज्ञान था और संस्कृत के श्लोकों का वे अत्यंत शुद्ध उच्चारण करते थे।

उनकी विद्वत्ता और कठोर धार्मिक अनुशासन के कारण आसपास के क्षेत्र में उनका बहुत सम्मान था। दूर-दूर से लोग उनसे धर्म और शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करने आते थे। स्वयं ब्राह्मण भी अपने ज्ञान और साधना को लेकर अत्यंत आश्वस्त थे। धीरे-धीरे यह आत्मविश्वास उनके भीतर एक सूक्ष्म अहंकार का रूप ले चुका था।

प्रतिदिन प्रातः वे ऊँचे स्वर में वेद-मंत्रों और शास्त्रों का पाठ करते। उनके स्वर में गंभीरता थी, उच्चारण में शुद्धता थी, किंतु कहीं न कहीं उस पाठ में आत्मज्ञान से अधिक अपने ज्ञान का गर्व भी समाया हुआ था।

उन्हें यह विश्वास हो गया था कि शास्त्रों का ज्ञान, धार्मिक नियमों का पालन और बाहरी शुचिता ही ईश्वर की प्राप्ति का सबसे बड़ा आधार है।

लेकिन ईश्वर की लीला निराली होती है। कभी-कभी वह मनुष्य को उसके ज्ञान से नहीं, बल्कि उसकी भूल से शिक्षा देता है।
एक श्लोक ने जगा दिया अहंकार

एक दिन प्रातःकाल ब्राह्मण अपने नित्य स्वाध्याय में लीन थे। पढ़ते-पढ़ते उनकी दृष्टि भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का वर्णन करने वाले एक श्लोक पर पड़ी। उस श्लोक का भाव था कि भगवान पतित-पावन हैं। वे दीनों, दुखियों, पापियों और समाज द्वारा उपेक्षित लोगों तक को अपनी करुणा से स्वीकार करते हैं। उनकी कृपा किसी जाति, वर्ग, पद या बाहरी योग्यता की मोहताज नहीं है।

ब्राह्मण ने जैसे ही यह भाव पढ़ा, उनके मन में एक प्रश्न उठा।

उनके भीतर का अहंकार बोल पड़ा-

"जो परम पवित्र हैं, वे अपवित्र लोगों को कैसे स्वीकार कर सकते हैं? जो स्वयं शुद्धता के प्रतीक हैं, वे पापियों को अपने समीप कैसे आने दे सकते हैं?"

उनकी बुद्धि ने भगवान की करुणा को अपनी सीमित दृष्टि से तौलना शुरू कर दिया।

वे कुछ क्षण तक उस पंक्ति को देखते रहे। फिर उन्होंने क्रोध और असहमति में अपनी कलम उठाई और शास्त्र में लिखी उस पंक्ति को काट दिया।

उन्हें लगा कि उन्होंने शास्त्र की एक त्रुटि सुधार दी है।

लेकिन वास्तव में उसी क्षण उन्होंने अपने भीतर के अहंकार को और मजबूत कर लिया था।

उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि जिस पंक्ति को वे कागज पर काट रहे हैं, वह उनके जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा बनने जा रही है।
वह रात, जिसने सब कुछ बदल दिया

उस रात ब्राह्मण अपने शयनकक्ष में सो रहे थे। आधी रात के समय उन्होंने एक अद्भुत स्वप्न देखा।

उन्होंने देखा कि मंदिर के गर्भगृह से स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उनके सामने चले आ रहे हैं। उनके शरीर पर पीतांबर था, सिर पर मोरपंख सुशोभित था और हाथों में मुरली थी। उनका मुख अत्यंत शांत और दिव्य था।

लेकिन अगले ही क्षण ब्राह्मण की दृष्टि भगवान के वक्षस्थल पर पड़ी।

उनके पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई।

भगवान के हृदय से रक्त की धारा बह रही थी।

ब्राह्मण घबरा गए। वे दौड़कर भगवान के चरणों में गिर पड़े और फूट-फूटकर रोने लगे।

उन्होंने करुण स्वर में पूछा—

"हे नारायण! हे माधव! आपको यह पीड़ा किसने दी? किसने आपके हृदय को इस प्रकार घायल कर दिया?"

भगवान श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण की ओर देखा। उनके मुख पर गंभीरता थी, लेकिन आँखों में करुणा।

भगवान ने कहा—

"प्रिय विप्र! यह घाव किसी और ने नहीं, तुमने ही मुझे दिया है।"

ब्राह्मण स्तब्ध रह गए।

उन्होंने कांपते हुए कहा—

"मैंने? प्रभु, मैं तो आपका भक्त हूँ। मैं प्रतिदिन आपका स्मरण करता हूँ, शास्त्रों का पाठ करता हूँ और धर्म के नियमों का पालन करता हूँ। मैं आपको कैसे चोट पहुँचा सकता हूँ?"

भगवान मुस्कुराए और बोले—

"तुमने उस पंक्ति को काट दिया, जिसमें मेरे दीनबंधु और पतित-पावन स्वरूप का वर्णन था। वह पंक्ति मेरे हृदय के अत्यंत निकट है, क्योंकि वही मेरे वास्तविक स्वरूप को प्रकट करती है।"

भगवान ने आगे कहा—

"तुमने केवल शास्त्र के एक वाक्य को नहीं काटा। तुमने मेरी करुणा को अपनी बुद्धि की सीमा में बाँधने का प्रयास किया। तुमने यह मान लिया कि कौन मेरे योग्य है और कौन मेरे योग्य नहीं। जबकि मैं तो उसी के लिए हूँ, जिसे संसार ने ठुकरा दिया है।"

"तुमने उस पंक्ति को कागज से मिटाया, लेकिन उसका आघात मेरे हृदय पर लगा।"

यह सुनते ही ब्राह्मण का अहंकार पूरी तरह टूट गया।
ज्ञान के सामने खड़ी हुई भक्ति

ब्राह्मण भगवान के चरणों में गिरकर रोने लगे।

उन्होंने कहा—

"हे दयानिधि! मुझे क्षमा करें। मैं अपने ज्ञान के अभिमान में अंधा हो गया था। मुझे लगा कि मैं शास्त्रों को समझता हूँ, जबकि वास्तव में मैं आपके प्रेम को समझ ही नहीं पाया। मैंने अपनी सीमित बुद्धि के तराजू पर आपकी असीम करुणा को तौलने का प्रयास किया।"

"मैं भूल गया था कि जीव अपनी योग्यता से आपके पास नहीं पहुँचता। आपकी कृपा ही उसे योग्य बनाती है। आपकी करुणा ही पतित को पावन करती है और आपकी भक्ति ही अयोग्य को भी अपने चरणों तक पहुँचा देती है।"

भगवान शांत भाव से उन्हें देखते रहे।

उस क्षण ब्राह्मण को पहली बार अनुभव हुआ कि वर्षों तक शास्त्र पढ़ने के बाद भी जिस सत्य को वे नहीं समझ सके, वह आज भगवान ने एक क्षण में उन्हें समझा दिया।

ज्ञान ने उन्हें विद्वान बनाया था, लेकिन भगवान की करुणा ने उन्हें विनम्र बनाया।

तभी उनकी नींद खुल गई।

उनका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था। आँखों से आँसू बह रहे थे और तकिया पूरी तरह आंसुओं से भीग चुका था।

लेकिन उस रात के बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई।
विद्वान वही, लेकिन अब भीतर अहंकार नहीं था

अगली सुबह जब ब्राह्मण ने शास्त्र खोला, तो उनकी आँखें उसी पंक्ति पर जाकर ठहर गईं, जिसे उन्होंने पिछले दिन काट दिया था।

कुछ क्षण तक वे उसे देखते रहे।

फिर उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

उन्होंने कांपते हाथों से उस पंक्ति को फिर से लिख दिया।

उस दिन पहली बार उन्होंने शास्त्र का पाठ अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने के लिए नहीं, बल्कि भगवान के चरणों में समर्पण के भाव से किया।

अब उनके स्वर में पहले जैसा गर्व नहीं था।

उसमें विनम्रता थी।

उसमें प्रेम था।

उसमें करुणा थी।

अब जब कोई गरीब, असहाय या समाज का उपेक्षित व्यक्ति उनके पास आता, तो वे उसे तुच्छ दृष्टि से नहीं देखते थे। वे समझ चुके थे कि ईश्वर की दृष्टि में मनुष्य की बाहरी पहचान से अधिक उसके हृदय की पुकार महत्वपूर्ण है।

वे जान चुके थे कि भगवान को पाने का मार्ग केवल शास्त्रों के पन्नों से होकर नहीं जाता, बल्कि वह विनम्रता, प्रेम और करुणा के हृदय से होकर गुजरता है।
कथा का संदेश

यह कथा केवल एक ब्राह्मण और भगवान श्रीकृष्ण की कथा नहीं है। यह हमारे भीतर छिपे उस अहंकार की कथा है, जो कभी ज्ञान का, कभी धन का, कभी जाति का, कभी पद का और कभी धर्म का अहंकार बनकर हमें दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है।

मनुष्य जब यह तय करने लगता है कि कौन भगवान के योग्य है और कौन नहीं, तभी वह भक्ति के वास्तविक अर्थ से दूर होने लगता है।

ईश्वर किसी एक वर्ग, जाति, समुदाय या विद्वानों की संपत्ति नहीं हैं। वे तो दीनबंधु हैं—दीनों के मित्र। वे पतित-पावन हैं—गिरे हुए को उठाने वाले। वे करुणासागर हैं—जिसकी कृपा का कोई अंत नहीं।

यदि ईश्वर केवल पुण्यात्माओं के होते, तो पापियों के लिए मुक्ति का मार्ग ही बंद हो जाता। यदि ईश्वर केवल योग्य लोगों को स्वीकार करते, तो संसार में किसी के लिए आशा शेष नहीं रहती।

ईश्वर की महानता इसी में है कि वे उस व्यक्ति को भी अपने हृदय से लगा लेते हैं, जिसे पूरी दुनिया ने अस्वीकार कर दिया हो।

इसीलिए सच्ची भक्ति का अर्थ केवल मंत्रों का उच्चारण करना नहीं है।

सच्ची भक्ति तब प्रारंभ होती है, जब हमारे भीतर से अहंकार समाप्त होता है।

ज्ञान हमें बताता है कि ईश्वर कौन हैं।

लेकिन प्रेम हमें यह अनुभव कराता है कि ईश्वर हमारे कितने निकट हैं।

और करुणा हमें यह सिखाती है कि यदि हम वास्तव में ईश्वर के भक्त हैं, तो हमें भी उनके प्रत्येक जीव के प्रति प्रेम, सम्मान और संवेदना रखनी चाहिए।

क्योंकि संभव है कि जिस व्यक्ति को हम तुच्छ समझकर अपने से दूर कर रहे हों, उसी के भीतर भगवान किसी रूप में हमारी परीक्षा ले रहे हों।

अंततः यही इस कथा का सबसे बड़ा संदेश है-
"भगवान की करुणा को अपनी सीमित बुद्धि से मत तौलो।

ईश्वर की कृपा वहाँ भी पहुँचती है, जहाँ मनुष्य की दृष्टि समाप्त हो जाती है।
और भक्ति की शुरुआत वहीं से होती है, जहाँ अहंकार का अंत होता है।"

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