चढ़ावा चोरी
जय प्रकाश कुवंरलालच ऐसा रोग है,
इससे बिरले बचा है कोय।
जो लालच से बच गया,
वह संत महात्मा होय।।
दान चढ़ावा कुछ देते,
कुछ को चोरी का काम।
धर्मस्थल भी अब इससे नहीं बचे,
बचे न शिव, कृष्ण वो राम।।
देवता पाषाण हो बैठे मंदिरों में,
अंदर कपटी मानव लुटे चढ़ावा।
इन कपटी चोरों को,
कुछ बाहर बैठे देते बढ़ावा।।
मिलजुल सब भाग हैं लेते,
ईश्वर से भी न इनको डर।
ऐसे पापी सोच रहे हैं,
वे सदा रहेंगे अमर।।
मानव अदालत से छुट भी गये,
ईश्वर की अदालत से ये कैसे बच पाएंगे।
मंदिरों का चढ़ावा लुटने वाले,
सीधे नर्क में जाएंगे।।
चढ़ावा चोरी का दाना खाना,
सबसे बड़ा यह व्याधि है।
लाख सफाई दे अदालत में,
खुद अपनी आत्मा में ही वह अपराधी है।।
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