स्वाभिमान / बलिदान
अरुण दिव्यांशभारतवर्ष का वासी हूॅं मैं ,
भारतवर्ष का संस्कार है ।
सनातनी संत वंशज हूॅं ,
हर धर्मों से हमें प्यार है ।।
सनातनी संत सबके प्यारे ,
आदर स्नेह ही आचार है ।
दरवाजे आए जन जन को ,
मृदुल वाणी में सत्कार है ।।
यथाशक्ति संग तथाभक्ति ,
आदर सहित व्यवहार है ।
आदर निष्ठा प्यार लुटाना ,
सनातनी जीवन सार है ।।
षष्ठ शास्त्र अठारह पुराण ,
और मिलते वेद चार हैं ।
गंगा यमुना यहाॅं है पावन ,
मथुरा काशी हरिद्वार है ।।
जिस देश में गंगा है बहती ,
भारतीयता स्वाभिमान है ।
जिस राष्ट्र का तिरंगा प्यारा ,
जिस रक्षा में बलिदान है ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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