तिरुपति बालाजी की ठोड़ी पर आज भी औषधि क्यों लगाई जाती है?

लेखक आनंद हठिला
एक भावपूर्ण कथा
तिरुमला की पवित्र पहाड़ियों पर भगवान श्री वेंकटेश्वर का दिव्य धाम विराजमान है। कहते हैं कि कई वर्ष पहले नीचे बसे एक गाँव में एक वृद्ध ग्वाला रहता था। उसके पास अनेक गौएँ थीं और वह प्रतिदिन सुबह-सुबह उनका ताज़ा दूध लेकर कठिन पहाड़ी रास्ता पार करता और भगवान बालाजी के चरणों में अर्पित करता।
उम्र बढ़ चुकी थी, लेकिन उसकी भक्ति कभी नहीं थकी।
एक दिन भगवान ने उसकी प्रेमभरी सेवा देखकर मन ही मन सोचा, "मेरा यह भक्त अब वृद्ध हो चुका है। रोज़ इतनी कठिन चढ़ाई चढ़ना उसके लिए आसान नहीं।"
रात में भगवान ने उसे स्वप्न में दर्शन देकर कहा,
"वत्स, अब तुम इतना कष्ट मत उठाया करो। मेरी व्यवस्था मैं स्वयं कर लूँगा।"
ग्वाला हाथ जोड़कर बोला,
"प्रभु, यह सेवा मेरा जीवन है। यदि मैं दूध लेकर न आऊँ, तो जीकर भी क्या करूँ?"
भगवान मुस्कुरा दिए, पर भक्त नहीं माना।
तब भगवान ने एक अद्भुत लीला रची।
हर रात वे साधारण ग्वाले का वेश धारण कर उस गौशाला में पहुँचते और स्वयं गौमाताओं का दूध पी लेते। सुबह जब वृद्ध ग्वाला दूध दुहने जाता, तो एक भी गाय दूध नहीं देती।
यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा।
ग्वाले को लगा कि अवश्य कोई चोर रात में आकर दूध चुरा ले जाता है। उसने एक रात जागकर पहरा देने का निश्चय किया।
आधी रात को उसने सचमुच एक ग्वाले को गायों के पास देखा।
वह क्रोधित होकर लाठी लेकर दौड़ा। सामने वाला तेज़ी से भागने लगा। ग्वाले ने पूरी ताकत से लाठी फेंकी। लाठी जाकर उस रहस्यमयी ग्वाले की ठोड़ी पर लगी और वह अंधेरे में ओझल हो गया।
अगली सुबह दूध लेकर जब वह भगवान बालाजी के मंदिर पहुँचा, तो दर्शन करते ही उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
भगवान की दिव्य प्रतिमा की ठोड़ी से रक्त की बूँदें टपक रही थीं।
ग्वाला घबरा उठा। उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
"प्रभु! आपको किसने चोट पहुँचाई?"
भगवान की करुणामयी वाणी सुनाई दी,
"जिसने रात में उस ग्वाले को लाठी मारी थी।"
भक्त हैरान रह गया।
भगवान ने उसे एक स्तंभ के पास जाकर देखने को कहा। वहाँ लगे चमकदार पत्थर में उसे किसी और का नहीं, अपना ही चेहरा दिखाई दिया।
उसी क्षण उसे सारी लीला समझ आ गई।
वह रोते हुए भगवान के चरणों में गिर पड़ा।
"प्रभु! मैं आपको पहचान न सका। मुझे क्षमा कर दीजिए।"
भगवान ने प्रेम से कहा,
"मैं तुम्हें कष्ट से बचाना चाहता था, इसलिए स्वयं दूध लेने आता था।"
भक्त ने काँपते हाथों से औषधि और कपूर का लेप बनाकर भगवान की ठोड़ी पर लगाया।
भगवान प्रसन्न होकर बोले,
"आज से मेरी ठोड़ी पर यह औषधि प्रतिदिन लगाई जाएगी, ताकि संसार तुम्हारी निष्काम सेवा और मेरे भक्त के प्रति मेरे प्रेम को कभी न भूल सके।"
फिर भगवान ने उससे वर माँगने को कहा।
वृद्ध भक्त बोला,
"प्रभु, मुझे धन, वैभव या स्वर्ग नहीं चाहिए। बस इतना वर दीजिए कि जीवन भर आपकी सेवा करने का अधिकार कभी मुझसे न छिने।"
भगवान वेंकटेश्वर ने मुस्कुराकर उसका वर स्वीकार कर लिया।
कहा जाता है कि उसी दिव्य स्मृति के कारण आज भी तिरुपति बालाजी की ठोड़ी पर विशेष कपूर-मिश्रित औषधि का लेप लगाया जाता है। यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि भगवान और उनके निष्काम भक्त के अमर प्रेम का प्रतीक माना जाता है।
॥ गोविंदा... गोविंदा...
श्री वेंकटेश्वर स्वामी की जय! ॥〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️@
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