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पावन सावन अति मनभावन

पावन सावन अति मनभावन

कुमार महेंद्र
सृष्टि के रज-रज, रग-रग में,
हर-हर महादेव परम स्तुति।
आचार-विचार विमल, मृदुल हों,
शुद्ध सात्त्विक भाव-प्रस्तुति।
शुचिता-पथ आलोकित जीवन,
तन-मन शिवमय, चित्त पावन।
पावन सावन अति मनभावन।।


रिमझिम रिमझिम मेघ बरसते,
छाई चहुँदिशि सुख की बहार।
नव आशाओं के अंकुर फूटें,
उज्ज्वल हो हर घर-परिवार।
स्नेह-सुधा से सिंचित संबंध,
घट-घट बरसे नेह सुहावन।
पावन सावन अति मनभावन।।


प्रकृति नवयौवन इठलाती,
हरित धरा का दिव्य श्रृंगार।
पुलकित होता जन-जन जीवन,
मिटता मन का घोर अंधकार।
मधुर मिलन, मुस्कानें खिलतीं,
हर्षित होता घर का प्रांगण।
पावन सावन अति मनभावन।।


खेत-खलिहान, वन-उपवन सब,
गाएँ समृद्धि के मंगल-गीत।
मुख-मंडल पर सहज मुस्कानें,
हृदय-पटल पर अमिट हो प्रीत।
सदाचार-सौरभ से महकें,
जन-मन, घर-देहरी, आँगन।
पावन सावन अति मनभावन।।


शिव-कृपा से मंगल बरसे,
सुख-समृद्धि से भरे जहान।
दया, धर्म, करुणा, सद्भाव से,
महके भारत की शान।
ऋतु-राज श्रावण का वंदन,
मंगलमय हो जन-जीवन।
पावन सावन अति मनभावन।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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