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बिहार की जीवनरेखा गंगा: ऐतिहासिक संगम, सांस्कृतिक चेतना

बिहार की जीवनरेखा गंगा: ऐतिहासिक संगम, सांस्कृतिक चेतना

सत्येन्द्र कुमार पाठक
विहंगम वैचारिक पृष्ठभूमि में बिहार की भौगोलिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान गंगा और उसकी सहायक नदियों के प्रवाह पथ से निर्धारित होती है। यह केवल एक जलमार्ग नहीं, बल्कि महाजनपदों के उदय, ऋषियों की वैचारिक क्रांति और आधुनिक पर्यावरणीय चेतना की केंद्रीय धुरी है। प्रस्तुत आलेख गंगा बेसिन की विशालता, इसके तटों पर बसे ऐतिहासिक नगरों के साम्राज्यिक महत्व और इसके पुनरुद्धार में लगी संस्थाओं के अवदान का एक समग्र दस्तावेजीकरण है। बिहार में गंगा बेसिन की व्यापकता एवं जनसांख्यिकीय विन्यास
भौगोलिक और जलीय दृष्टि से संपूर्ण बिहार राज्य गंगा नदी के जलग्रहण क्षेत्र (कैचमेंट एरिया) का हिस्सा है। केंद्रीय जल आयोग और सेंटर फॉर गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट एंड स्टडीज) के आधिकारिक नदी एटलस के अनुसार, बिहार के सभी ३८ जिले किसी न किसी उप-बेसिन के माध्यम से गंगा से संबद्ध हैं।
, मुख्य गंगा नदी के तट पर सीधे तौर पर १२ जिले स्थित हैं: बक्सर, भोजपुर, सारण, पटना, वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय, लखीसराय, खगड़िया, मुंगेर, भागलपुर और कटिहार। वर्ष २०११ की जनगणना और राज्य नीति आयोग के भू-स्थानिक आंकड़ों के समन्वय के आधार पर, बिहार के इस समृद्ध गंगा बेसिन क्षेत्र के अंतर्गत कुल ३९,१६४ राजस्व गांव आते हैं। ये गांव मुख्य रूप से जलोढ़ मैदान (Alluvial Plains) पर स्थित हैं, जहाँ गंगा द्वारा लाई गई उपजाऊ मिट्टी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का आधार है।
मुख्य गंगा तटीय क्षेत्र में : पटना, भोजपुर, बक्सर, बेगूसराय, कटिहार, भागलपुर, खगड़िया, लखीसराय, समस्तीपुर, वैशाली, सारण। पुनपुन और सोन बेसिन क्षेत्र: जहानाबाद, अरवल, औरंगाबाद। किउल-हरोहर एवं फल्गु/पंचाने प्रवाह क्षेत्र: गया, नवादा, नालंदा। कर्मनाशा और दक्षिण-पश्चिमी सोन क्षेत्र: रोहतास, कैमूर , बूढ़ी गंडक मुजफ्फरपुर है।
नदी-संगम और साम्राज्यिक नगरों का उद्भव - बिहार का इतिहास नदियों के संगम पर बने नगरों और उनके सामरिक-व्यापारिक विकास का इतिहास है। विभिन्न साम्राज्यों के काल में इन संगमों पर विशिष्ट नगरों की स्थापना की गई: . गंगा और सोन नदी का संगम: मनेर , शेरपुर एवं दानापुर (पाटलिपुत्र का अग्रभाग) - साम्राज्यिक काल: हर्यंक राजवंश (५ वीं सदी ईसा पूर्व) से लेकर मुगल और सूर वंश (१६वीं सदी)। मूल रूप से पाटलिपुत्र की नींव मगध सम्राट अजातशत्रु के पुत्र उदायिन ने रखी थी। सोन और गंगा के इस प्राचीन संगम क्षेत्र (मनेर) को मध्यकाल में सूफी संतों ने अपनी चेतना का केंद्र बनाया। बाद में शेरशाह सूरी ने इस पूरे तटीय क्षेत्र के सामरिक महत्व को समझते हुए आधुनिक पटना की प्रशासनिक किलेबंदी की।।मनेर शरीफ सूफी संस्कृति का महान केंद्र बना, जो गंगा-जमुनी तहजीब और जल-व्यापार का मुख्य नाका था।
गंगा और पुनपुन नदी का संगम: फतुहा - प्राचीन मगध काल से लेकर मध्यकालीन कबीर पंथ का उत्कर्ष काल में पटना से पूर्व में जहाँ पुनपुन, मढ़र और गंगा का मिलन होता है, उस त्रिवेणी पर फतुहा नगर का विकास हुआ। यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही वस्त्र उद्योग (सूती वस्त्र) और कृषि व्यापार का बड़ा केंद्र रहा। धार्मिक रूप से इसे कबीरपंथियों का प्रमुख गढ़ माना गया, जहाँ प्रतिवर्ष विशाल सांस्कृतिक समागम होते आए हैं।
गंगा और गंडक नदी का संगम: हाजीपुर और सोनपुर - साम्राज्यिक काल: वज्जि संघ (वैशाली काल) और मध्यकालीन बंगाल सल्तनत में १४वीं शताब्दी में बंगाल के सुल्तान हाजी इलियास शाह ने गंडक और गंगा के इस सामरिक मुहाने पर हाजीपुर शहर की स्थापना की। इसके ठीक सामने सारण तट पर सोनपुर स्थित है।
: यह संगम स्थल प्राचीन काल से ही 'हरिहर क्षेत्र' के रूप में विख्यात है। पौराणिक मान्यताओं में यह गज-ग्राह की मोक्ष भूमि है, जिसने कालांतर में विश्व के सबसे बड़े पशु मेले का रूप लिया। गंगा और सरयू (घाघरा) नदी का संगम: छपरा है। साम्राज्यिक काल: गुप्त काल, पाल काल और ब्रिटिश व्यापारिक काल में डोरीगंज के समीप सरयू नदी का गंगा में विलय होता है। इस संगम क्षेत्र के प्रभाव से छपरा एक विशाल व्यापारिक मंडी के रूप में विकसित हुआ। शोरा (Saltpetre) और अफीम के व्यापारिक काल में डच, फ्रांसीसी और ब्रिटिश जहाजों के लिए यह गंगा मार्ग का मुख्य पड़ाव था।. गंगा और कोसी/बूढ़ी गंडक का संगम: खगड़िया और कुरुसेला (कटिहार) का साम्राज्यिक काल में अंग महाजनपद और पाल राजवंश है। खगड़िया में बूढ़ी गंडक और कुरुसेला में कोसी का गंगा से मिलन होता है। ये क्षेत्र जल-परिवहन और जलीय जैव-विविधता (जैसे गांगेय डॉल्फिन) के ऐतिहासिक गवाह रहे हैं।
बिहार की भूमि केवल राजनीतिक साम्राज्यों की ही नहीं, बल्कि वैश्विक आध्यात्मिक क्रांतियों की जननी रही है। यहाँ छह प्रमुख धार्मिक धाराओं का अद्भुत समन्वय देखा जा सकता है:
सौर संस्कृति (सूर्य उपासना): बिहार की आत्मा में रची-बसी सौर संस्कृति का सबसे प्रदीप्त उदाहरण महापर्व छठ है। यह किसी मूर्ति की नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष प्रकृति और ऊर्जा के स्रोत सूर्य की आराधना का पर्व है, जो वैदिक कालीन ऋचाओं के व्यावहारिक जीवंत रूप को दर्शाता है। औरंगाबाद का त्रेतायुगीन देव सूर्य मंदिर और गया का सूर्यपोखर इसके पुरातात्विक साक्ष्य हैं।
शाक्त संस्कृति: शक्ति पूजा के अंतर्गत ५१ शक्तिपीठों में शुमार पटना की पटन देवी, मुंगेर का चंडिका स्थान (सती की बाईं आँख गिरने की मान्यता), और सारण का आमी (अम्बिका भवानी) मंदिर इस क्षेत्र की तांत्रिक और शाक्त साधना की प्राचीनता को प्रमाणित करते हैं।
ब्रह्म (ऋषि परंपरा): बक्सर की धरती महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि रही, जहाँ उन्होंने सनातन संस्कृति के संरक्षकों (राम-लक्ष्मण) को अस्त्र-शस्त्र और ब्रह्मज्ञान की शिक्षा दी। मिथिला क्षेत्र में महर्षि याज्ञवल्क्य (उपनिषद कालीन दार्शनिक), गौतम ऋषि और उनकी पत्नी अहिल्या का प्रसंग न्याय दर्शन की तार्किकता को रेखांकित करता है। कपिल मुनि का आश्रम सांख्य दर्शन का प्रणेता बना।
शैव संस्कृति: सुलतानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा के बीच स्थित अजगैबीनाथ मंदिर शैव साधना का अप्रतिम उदाहरण है। इसके अतिरिक्त, सोनपुर का हरिहरनाथ मंदिर भारतीय धर्म की वह अनूठी धरोहर है जहाँ शैव (शिव) और वैष्णव (विष्णु) मतों के ऐतिहासिक संघर्ष को समाप्त कर दोनों की संयुक्त पूजा की परंपरा शुरू की गई।
वैष्णव संस्कृति: गया का विष्णुपद मंदिर और फल्गु नदी का तट वैष्णव मत का वैश्विक केंद्र है। यह पितृपक्ष के दौरान पूरे विश्व के सनातन धर्मावलंबियों के लिए मोक्ष और पिंडदान का एकमात्र सर्वोपरि स्थल है
बौद्ध संस्कृति: 'बिहार' शब्द की उत्पत्ति ही बौद्ध भिक्षुओं के 'विहार' करने से हुई है। बोधगया में निरंजना (फल्गु) नदी के तट पर सिद्धार्थ को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई। इसके बाद राजगीर, वैशाली और नालंदा बौद्ध दर्शन, शून्यवाद और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा (नालंदा विश्वविद्यालय) के वैश्विक दीपस्तंभ बने।
जैन संस्कृति: जैन धर्म के अंतिम और २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर की जन्मस्थली वैशाली का कुंडलपुर है और उनकी निर्वाण स्थली नालंदा का पावापुरी (जल मंदिर) है। राजगीर की पंच पहाड़ियों पर स्थित जैन मंदिर इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि बिहार की माटी ने संसार को अपरिग्रह और अहिंसा का पहला पाठ पढ़ाया।
वर्तमान सदी में गंगा नदी के अस्तित्व, इसकी अविरलता और निर्मलता को बनाए रखने के लिए विभिन्न स्तरों पर संस्थागत और सामाजिक प्रयास किए जा रहे हैं। इनमें तीन संस्थाओं और मिशनों का योगदान सबसे महत्वपूर्ण है: । जीवनधारा नमामि गंगे - केवल एक सरकारी परियोजना नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का आंदोलन है। इसके तहत निम्नलिखित कार्य प्रमुखता से किए जा रहे हैं । गंगा में गिरने वाले शहरी सीवेज (गंदे पानी) को रोकने के लिए 'एसटीपी' (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) की स्थापना। गंगा की महत्ता को जन-जन तक पहुँचाने के लिए घाटों का आधुनिकीकरण और 'गंगा आरती' जैसे सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से पर्यटन और आस्था को जोड़ना। नदी-तटीय कृषि: गंगा के दोनों किनारों पर जैविक खेती को बढ़ावा देना ताकि रासायनिक उर्वरकों का रिसाव नदी के जल को दूषित न करे।
. दिव्य गंगा सेवा मिशन - इस मिशन का मुख्य ध्यान गंगा के आध्यात्मिक वैभव की पुनर्स्थापना और उसकी जलीय जैव-विविधता के संरक्षण पर है । सुल्तानगंज से कहलगंव (भागलपुर) के बीच स्थित 'विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य' की देखरेख और राष्ट्रीय जल जीव (डॉल्फिन/सोंस) के संरक्षण में इस मिशन ने बड़ी भूमिका निभाई है। गंगा के जलस्तर को बनाए रखने के लिए इसके जलग्रहण क्षेत्रों और सहायक नदियों (जैसे सोन, पुनपुन, बूढ़ी गंडक) के किनारों पर व्यापक स्तर पर वनीकरण अभियान चलाना।
जिला गंगा समिति - राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन की जमीनी स्तर पर कार्य करने वाली सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक और जन-भागीदारी इकाई है। बिहार के सभी १२ गंगा तटीय जिलों के जिलाधिकारियों (DM) की अध्यक्षता में गठित ये समितियां स्थानीय स्तर पर काम करती हैं:।: जिला स्तर पर ठोस कचरा प्रबंधन को देखना और यह सुनिश्चित करना कि औद्योगिक अपशिष्ट सीधे नदी में न जाएँ।।स्थानीय युवाओं, मछुआरों और स्वयंसेवी संस्थाओं को 'गंगा दूत' के रूप में संगठित करना। प्लास्टिक मुक्त गंगा अभियानों का संचालन करना और घाटों की स्वच्छता बनाए रखना।
सहायक नदियों का पुनरुद्धार: मुख्य गंगा को साफ रखने के लिए ज़िला स्तर पर मिलने वाली छोटी बरसाती नदियों और नालों की जियो-टैगिंग व सफाई सुनिश्चित करना जरूरी है। बिहार का अतीत, वर्तमान और भविष्य गंगा बेसिन के जल प्रबंधन और इसकी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर निर्भर है। प्राचीन काल में जहाँ उदायिन और हाजी इलियास शाह जैसे शासकों ने नदी तटों पर साम्राज्यों की स्थापना की, वहीं याज्ञवल्क्य, बुद्ध और महावीर ने इसके मैदानों में विचारों की अमर फसल उगाई। आज के युग में, जब पर्यावरण संकट गहरा रहा है, 'जीवनधारा नमामि गंगे', 'दिव्य गंगा मिशन' और 'जिला गंगा समिति' जैसी संस्थाएं आधुनिक तकनीक और जन-भागीदारी के माध्यम से इस महान नदी के पुनरुद्धार के संकल्प को सिद्ध कर रही हैं। गंगा की निर्मलता ही बिहार की समृद्धि और इसकी सांस्कृतिक चेतना की दीर्घायु का एकमात्र मार्ग है।
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