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"ध्वंस का सृजन-विधान"

"ध्वंस का सृजन-विधान"

पंकज शर्मा
प्रिय मित्रों ध्वंस को मनुष्य प्रायः अंत मान लेता है, जबकि प्रकृति उसे आरंभ का प्रथम संस्कार मानती है। बीज का विघटन ही वृक्ष का जन्म है एवं पतझड़ का वैराग्य ही वसंत का निमंत्रण। जो कुछ बाहर से टूटता हुआ दिखाई देता है, उसके भीतर जीवन किसी नए रूप में स्वयं को संयोजित कर रहा होता है। इसलिए खंडहरों से भयभीत होने की अपेक्षा उनके मौन में छिपी सृजन-ध्वनि को सुनना अधिक आवश्यक है।


किसी भी मनुष्य का वास्तविक वैभव उसकी अक्षुण्णता में नहीं, अपितु टूटकर पुनः उठ खड़े होने की क्षमता में निहित है। पीड़ा जब आत्मा को परिष्कृत करती है, तब वही ध्वंस अनुभूति की निधि बन जाता है। जीवन का प्रत्येक विघटन एक अप्रकट सत्य का द्वार है; जो उस द्वार से निर्भय होकर प्रवेश करता है, वही अंततः अपने भीतर छिपे अमूल्य खजाने का साक्षात्कार करता है।


. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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