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बिना मिहनत पैसा राशन

बिना मिहनत पैसा राशन

जय प्रकाश कुवंर
मुफ्त खाये वाला लोग,
फुटानी करे में हरान बा।
ऐने सरकार मुफ्त बांटे में,
अलगे खुब हलकान बा।।
लोग का मुफ्त राशन पैसा चाहीं,
सरकार का उनकर वोट चाहीं।
एह सबमें भ‌इल तालमेल बा,
देश में चाहे कतनो मचे तबाही।।
वोट के राजनीति ,
अब एतना गरमा ग‌इल।
गाँव देहात में सब ओर,
निकम्मापन छा ग‌इल।।
अब केहू के काम करे में,
तनिको मन लागत नइखे।
मुफ्त के राशन पैसा खाके भी,
दरिदर घर से भागत नइखे।।
खेती बारी, मिहनत मजदूरी,
केहू करे के चाहत नइखे,
मुफ्त में जब राशन पैसा मिलत बा,
दिन कटत बा र‌ईस जैसे।।
नेता लोग के चांदी बा,
नया पीढ़ी के तबाही बा।
परिणाम लोग समझत नइखे,
मन में अइसन ढिलाही बा।।
भविष्य में अइसन प्रजातंत्र में,
खाली नेता लोग सुखी रही।
देश अतना बिगड़ जाई जे,
इतिहास एकर सब कहानी कही।।
बात खांटी बा भले ही,
मुफ्तखोर लोग के तीखा लागी।
आदत अइसन बिगड़ जाई जे,
परिवार से कबो ना दुख भागी।
नेता नेता सब एक बाड़े,
केहू तो शासन करबे करी।
जेह दिन मुफ्त स्कीम बंद होई,
मुफ्तखोर लोग सब रो रो के मरी।।

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