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"जीवन का स्वधर्म"

"जीवन का स्वधर्म"

पंकज शर्मा
जीवन की प्रत्येक अवस्था अपने भीतर एक विशिष्ट साधना समेटे रहती है। बाल्य का सौंदर्य विनय में, यौवन का तेज संयम में, प्रौढ़ता की गरिमा न्याय में और वार्धक्य का वैभव प्रज्ञा में निहित है। जो समय के साथ केवल आयु नहीं, अपने अंतर्मन का भी परिष्कार करता है, वही अनुभवों को आत्मविकास का आलोक बना पाता है।


मनुष्य की वास्तविक परिपक्वता वर्षों की गणना से नहीं, गुणों की परिपक्वता से मापी जाती है। प्रत्येक अवस्था अगले सोपान की तैयारी है; अतः जीवन का उद्देश्य केवल समय बिताना नहीं, बल्कि प्रत्येक क्षण को चरित्र की साधना में रूपांतरित करना है। अंततः स्वयं का साक्षात्कार उसी को प्राप्त होता है, जिसने जीवन के प्रत्येक कालखंड को उसके स्वधर्म के साथ जिया हो।


. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) 
 पंकज शर्मा (कमल सनातनी
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