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वैदिक विज्ञान और भारत की ऋषि परंपरा

वैदिक विज्ञान और भारत की ऋषि परंपरा

सत्येन्द्र कुमार पाठक
सनातन संस्कृति और प्राचीन भारतीय वास्तुकला, ज्योतिष, गणित और आयुर्वेद के ग्रंथों को जब हम आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखते हैं, तो एक अभूतपूर्व तथ्य सामने आता है। पश्चिमी जगत या आधुनिक शिक्षा पद्धति जिसे अक्सर 'पौराणिक कथा', 'रूपक' या 'कल्पना' कहकर खारिज कर देती है, उसकी तह में गहरे वैज्ञानिक सिद्धांत छिपे हैं।।ऐसा ही एक सबसे प्रसिद्ध और अक्सर गलत समझा जाने वाला रूपक है—"शेषनाग के फन पर टिकी पृथ्वी"।।सामान्य जनमानस में इसकी छवि एक विशालकाय जैविक सर्प के रूप में बना दी गई है, जो पृथ्वी को अपने सिर पर उठाए हुए है। परंतु यदि हम इस शब्द के मूल संस्कृत व्याकरण, खगोलशास्त्र और वैदिक साहित्य की गहराई में जाएं, तो यह कोई अंधविश्वास नहीं बल्कि अंतरिक्ष भौतिकी का एक अत्यंत जटिल और सटीक सिद्धांत है। यह आलेख इस रूपक के वास्तविक वैज्ञानिक अर्थ को उजागर करते हुए भारत के उन महान ऋषियों की वैज्ञानिक खोजों का एक विस्तृत प्रामाणिक दस्तावेज प्रस्तुत करता है, जिन्होंने आधुनिक विज्ञान से हजारों वर्ष पूर्व मानव सभ्यता को ज्ञान की नई रोशनी दिखाई थी।
शेषनाग का वैज्ञानिक और खगोलीय विश्लेषण।- वैदिक साहित्य की यह विशेषता रही है कि उसमें ब्रह्मांड के अत्यंत गूढ़ और अमूर्त नियमों को आम जनमानस के लिए प्रतीकों और रूपकों के माध्यम से समझाया गया है। संस्कृत एक अत्यंत वैज्ञानिक भाषा है जहाँ हर शब्द का अर्थ उसके संदर्भ और धातु (Root) पर निर्भर करता है। 'शेषनाग' शब्द का संधि विच्छेद और उसका खगोलीय अर्थ निम्नलिखित है: संस्कृत व्याकरण के अनुसार 'शेष' का अर्थ होता है—"वह जो अंत में बच जाए" या "अविनाशी"। खगोलशास्त्र के दृष्टिकोण से, जब पूरे ब्रह्मांड के दृश्य पिंडों (ग्रहों, तारों, नक्षत्रों) को हटा दिया जाए, तो जो अनंत शून्यता या शून्य आकाश बचता है, उसे 'शेष' कहा गया है। अर्थात, 'शेष' का सीधा तात्पर्य उस अंतरिक्ष से है, जो पृथ्वी और अन्य खगोलीय पिंडों के परे अनंत तक विस्तृत है। भौतिक विज्ञान में सर्प (नाग) की गति को लहरदार या तरंगमय माना जाता है। वैदिक विज्ञान में 'नाग' शब्द का प्रयोग किसी रेंगने वाले जीव के लिए नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में व्याप्त उन अदृश्य ऊर्जा रेखाओं , गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय बलों के संयुक्त प्रभाव के लिए किया गया है जो तरंगों के रूप में पूरे ब्रह्मांड में गतिमान हैं। इस पूरे रूपक का वास्तविक अर्थ यह है कि पृथ्वी अंतरिक्ष (शेष) में बिना किसी भौतिक सहारे के, केवल सूर्य और अन्य खगोलीय पिंडों के बीच क्रियाशील अदृश्य गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय शक्तियों (नाग) के जटिल संतुलन के कारण टिकी हुई है। यह संतुलन ही पृथ्वी को अंतरिक्ष में अपनी कक्षा (Orbit) में स्थिर रखता है और उसे एक गोलाकार या अंडाकार आकार प्रदान करता है। यह वैज्ञानिक समझ उन सभी पाश्चात्य भ्रांतियों को सिरे से खारिज करती है जो यह मानती थीं कि प्राचीन काल में लोग पृथ्वी को चपटा मानते थे।।वैदिक साहित्य में शेषनाग को जिन 'काल्पनिक रेखाओं' के रूप में दर्शाया गया है, वे आधुनिक विज्ञान के 'मैग्नेटिक फील्ड लाइन्स और 'ग्रेविटेशनल वेव्स' का ही प्रतीक हैं।
प्राचीन भारतीय ऋषियों की महान वैज्ञानिक उपलब्धियां - जिन्हें आज का पश्चिमी जगत "रिसर्चर" या "साइंटिस्ट" का नाम देकर अपनी खोज बताता है, वे वास्तव में भारत के प्राचीन द्रष्टा और ऋषि थे। उन्होंने आज से हजारों वर्ष पूर्व प्रयोगशालाओं के बिना, केवल अपनी ध्यान-चेतना, गणितीय मेधा और वेधशालाओं के दम पर ब्रह्मांड के उन रहस्यों को खोज निकाला था, जिन्हें स्वीकार करने में आधुनिक पश्चिमी विज्ञान को सदियों लग गए
आर्यभट्ट: खगोल विज्ञान के आदिपुरुष - खोज व वैज्ञानिक सिद्धांत: आर्यभट्ट ने ५वीं शताब्दी में अपने क्रांतिकारी ग्रंथ 'आर्यभट्टियम्' की रचना की। उन्होंने स्पष्ट रूप से घोषणा की कि पृथ्वी गोल है और यह अंतरिक्ष में स्थिर नहीं है, बल्कि अपने अक्ष (Axis) पर घूमती है। उन्होंने ही सबसे पहले दुनिया को सूर्यकेंद्रित मॉडल (Heliocentric Model) का प्रारंभिक रूप दिया, जिसके तहत ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं। उन्होंने राहु-केतु जैसी पौराणिक अवधारणाओं को दरकिनार कर सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण का सटीक वैज्ञानिक कारण (पृथ्वी और चंद्रमा की छाया) बताया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने पृथ्वी की परिधि (Circumference) की गणना ३९,९६८ किलोमीटर की थी, जो आधुनिक विज्ञान द्वारा मापी गई परिधि (४०,०७५ किमी) के अविश्वसनीय रूप से निकट है (केवल ०.२% का अंतर)। गणित के क्षेत्र में उन्होंने त्रिकोणमिति के सिद्धांत दिए और पाई (π) का मान 3.1416 निर्धारित किया। आर्यभट्ट का ५वीं शताब्दी ईस्वी (४७६ ईस्वी में जन्म) है। पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना, बिहार)। यह गुप्त साम्राज्य का स्वर्ण युग था। वे सम्राट बुधगुप्त या चंद्रगुप्त द्वितीय के कालखंड के समकालीन माने जाते हैं, जब मगध साम्राज्य ज्ञान-विज्ञान का वैश्विक केंद्र था।
भास्कराचार्य (भास्कर II): न्यूटन से पूर्व गुरुत्वाकर्षण के प्रणेत सर आइजैक न्यूटन से लगभग ५०० वर्ष पूर्व, १२वीं शताब्दी में भास्कराचार्य ने अपने अमर ग्रंथ 'सिद्धांत शिरोमणि' (जिसके चार भाग हैं: लीलावती, बीजगणित, ग्रहगणिताध्याय और गोलाध्याय) में गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को स्थापित किया। उन्होंने लिखा:
"आकृष्टशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं गुरुस्वाभिमुखं स्वशक्त्या। आकृष्यते तत्पततीव भाति समे समन्तात् क्व पतत्वियं खे॥"अर्थात, पृथ्वी में एक विशिष्ट आकर्षण शक्ति (आकर्षण शक्तिश्च मही) है, जिसके कारण वह आकाश में मौजूद सभी भारी वस्तुओं को अपनी ओर खींचती है। ब्रह्मांड में सभी खगोलीय पिंड इसी शक्ति के कारण एक-दूसरे के संतुलन में रुके हुए हैं। उन्होंने कैलकुलस के शुरुआती सिद्धांतों और बीजगणित में चक्रवाल विधि (Cyclic Method) का प्रतिपादन भी किया। भास्कराचार्य का १२वीं शताब्दी ईस्वी (१११४ ईस्वी में जन्म) है। भौगोलिक क्षेत्र व साम्राज्य: विज्जलविड (आधुनिक बीजापुर/सह्याद्रि क्षेत्र, कर्नाटक/महाराष्ट्र)। यह दक्षिण भारत में पश्चिमी चालुक्य साम्राज्य का दौर था, जहाँ कला और विज्ञान को राजकीय संरक्षण प्राप्त था।
ब्रह्मगुप्त: शून्य और संख्या प्रणाली के विधाता - यद्यपि शून्य की अवधारणा भारत में पहले से थी, लेकिन ब्रह्मगुप्त ने ७वीं शताब्दी में अपने ग्रंथ 'ब्रह्मस्फुटसिद्धांत' में शून्य (0) को एक स्वतंत्र गणितीय संख्या के रूप में स्थापित किया। उन्होंने शून्य के साथ गणितीय संक्रियाओं (जोड़, घटाव, गुणा, भाग) के नियम बनाए (जैसे: किसी संख्या में से शून्य घटाने पर क्या बचता है, या शून्य से गुणा करने पर क्या होता है)। उन्होंने ऋणात्मक संख्याओं (Negative Numbers) की अवधारणा भी दी। आज का पूरा कंप्यूटर विज्ञान जिस बाइनरी सिस्टम (0 और 1) पर टिका है, उसकी नींव ब्रह्मगुप्त के इसी कार्य पर आधारित है।।ब्रह्मगुप्त।का : ७वीं शताब्दी ईस्वी (५९८ ईस्वी में जन्म) है। भीनमाल (आधुनिक राजस्थान)। यह गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य के उदय का कालखंड था, और वे राजा व्याघ्रमुख के संरक्षण में भीनमाल की प्रसिद्ध वेधशाला के प्रमुख थे।
ऋषि याज्ञवल्क्य: सौरमंडल के प्राचीन द्रष्टा - वैदिक काल के महान द्रष्टा याज्ञवल्क्य ने अपने ग्रंथ 'शतपथ ब्राह्मण' में ब्रह्मांड विज्ञान के कई रहस्यों को उजागर किया। उन्होंने सौरमंडल की गतियों का वर्णन करते हुए बताया कि सूर्य ही सभी ग्रहों के प्रकाश और गति का केंद्र है। उन्होंने सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी तथा एक वर्ष में दिनों की संख्या की जो प्रारंभिक गणनाएं कीं, वे आधुनिक खगोलीय मापों की आधारशिला बनीं। वैदिक काल (लगभग ९वीं से ८वीं शताब्दी ईसा पूर्व) है । मिथिला क्षेत्र (आधुनिक उत्तरी बिहार और नेपाल की तराई)। वे विदेह साम्राज्य के महान दूरदर्शी सम्राट राजा जनक के समकालीन और उनके मुख्य दार्शनिक व मार्गदर्शक थे।
महर्षि कणाद: परमाणु सिद्धांत के जनक - पाश्चात्य जगत जॉन डाल्टन को परमाणु सिद्धांत का जनक मानता है, परंतु उनसे लगभग २,००० वर्ष पूर्व महर्षि कणाद (जिन्हें उलूक भी कहा जाता है) ने अपने ग्रंथ 'वैशेषिक सूत्र' में परमाणु सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। कणाद ने स्पष्ट किया कि इस भौतिक जगत की हर वस्तु अत्यंत सूक्ष्म, अविभाज्य और शाश्वत कणों से मिलकर बनी है, जिसे उन्होंने 'परमाणु' कहा। उन्होंने बताया कि अकेले परमाणु में क्रियाशीलता नहीं होती, परंतु जब दो परमाणु मिलते हैं, तो 'द्विअणुक' (Molecule/अणु) का निर्माण होता है। इसके अलावा, उन्होंने गति , वेग और कार्य के अंतर्संबंधों को भी समझाया, जो आधुनिक न्यूटन के गति के नियमों के अत्यंत समरूप हैं। लगभग ६ठी से २टी शताब्दी ईसा पूर्व (महाजनपद काल) था । प्रभास पाटन (आधुनिक गुजरात) या मिथिला। यह वह दौर था जब भारत में मगध साम्राज्य और अन्य महाजनपदों का वैचारिक व राजनीतिक उत्कर्ष हो रहा था।
आचार्य नागार्जुन: रसायन विज्ञान और धातुकर्म के जादूगर - नागार्जुन प्राचीन भारत के सबसे महान रसायनशास्त्री (Chemist) और धातुविज्ञानी थे। उन्होंने अपने ग्रंथों 'रसरत्नाकर', 'रसकूप' और 'कक्षपुट' में पारे (Mercury) के शोधन, उसे ठोस बनाने की विधि, और विभिन्न धातुओं के भस्म बनाने की रासायनिक प्रक्रियाओं का वर्णन किया। उन्होंने तांबे, जस्ते और लोहे जैसी धातुओं के निष्कर्षण और मिश्र धातु (Alloys) बनाने की उन्नत तकनीकें खोजीं। प्राचीन भारत का रसायन विज्ञान कितना उन्नत था, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण दिल्ली के कुतुब परिसर में खड़ा 'लोह स्तंभ' है, जिसमें १५०० वर्षों के बाद भी जंग नहीं लगा है । लगभग दूसरी-तीसरी शताब्दी ईस्वी में बिहार राज्य का बराबर पर्वत समूह का नागार्जुन पहाड़ी कर्म क्षेत्र था । दक्षिण भारत (आधुनिक आंध्र प्रदेश और तेलंगाना क्षेत्र)। वे सातवाहन साम्राज्य के महान सम्राट यज्ञ श्री सातकर्णी के परम मित्र और समकालीन थे। उनके नाम पर ही नागार्जुनकोंडा विश्वविद्यालय का विकास हुआ ।
महर्षि सुश्रुत: शल्य चिकित्सा और प्लास्टिक सर्जरी के जनक - आज से २५०० वर्ष पूर्व महर्षि सुश्रुत ने काशी में चिकित्सा विज्ञान को एक अभूतपूर्व ऊंचाई दी। उनके द्वारा रचित 'सुश्रुत संहिता' शल्य चिकित्सा (Surgery) का विश्वकोश है। सुश्रुत को वैश्विक स्तर पर 'प्लास्टिक सर्जरी का जनक' (Father of Plastic Surgery) स्वीकार किया गया है। उन्होंने युद्ध या दंड के कारण कटी हुई नाक को ठीक करने की विधि खोजी, जिसे आज आधुनिक चिकित्सा में 'राइनोप्लास्टी' कहा जाता है। सुश्रुत संहिता में १०१ से अधिक प्रकार के शल्य उपकरणों (जैसे चिमटियाँ, सुइयाँ, कटर) का वर्णन है, जिन्हें इस खूबी से बनाया गया था कि वे बालों को भी बीच से दो भागों में काट सकते थे। उन्होंने मोतियाबिंद का ऑपरेशन, हड्डियों को जोड़ना, पथरी निकालना और मृत शरीर की चीर-फाड़ कर छात्रों को सिखाने की पद्धति विकसित की थी। लगभग ६ठी से ५वीं शताब्दी ईसा पूर्व में काशी (आधुनिक वाराणसी, उत्तर प्रदेश)। यह काशी महाजनपद का स्वर्ण काल था। वे काशी के राजा दिवोदास धन्वंतरि के सानिध्य में आयुर्वेद और शल्यक्रिया के इस महान केंद्र का संचालन करते थे।
. महर्षि चरक: आयुर्वेद और आंतरिक चिकित्सा के स्तंभ: महर्षि चरक प्राचीन भारत के सबसे महान चिकित्सक थे। उनके द्वारा परिष्कृत 'चरक संहिता' आयुर्वेद का मूलभूत ग्रंथ है। चरक ने त्रिदोष सिद्धांत (वात, पित्त, कफ) के आधार पर मानव शरीर के स्वास्थ्य की व्याख्या की। उन्होंने शरीर विज्ञान , चयापचय , पाचन क्रिया और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का गहन वैज्ञानिक विश्लेषण किया। चरक ने स्पष्ट किया कि बीमारी केवल बाहरी कारणों से नहीं, बल्कि शरीर के भीतर के तत्वों के असंतुलन और अशुद्ध आहार-विहार से होती है। उन्होंने जेनेटिक्स के प्रारंभिक सिद्धांतों का भी उल्लेख किया कि बच्चे का लिंग और शारीरिक विशेषताएं माता-पिता के किन अंशों पर निर्भर करती हैं। लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईस्वी के मध्य में उत्तर-पश्चिम भारत (तक्षशिला और पंजाब क्षेत्र)। वे कुषाण साम्राज्य (Kushan Empire) के सबसे प्रतापी सम्राट कनिष्क के समकालीन और उनके राजवैद्य थे।
महर्षि भारद्वाज: प्राचीन विमानशास्त्र और यंत्र विज्ञान - महर्षि भारद्वाज को प्राचीन भारतीय विज्ञान में यंत्रों और वैमानिकी का महान अध्येता माना जाता है। उनके नाम से जुड़े 'यंत्र सर्वस्व' और 'वैमानिक शास्त्र' जैसे ग्रंथों (जिन पर आज भी शोध जारी है) में ऐसे उड़ने वाले यानों की परिकल्पना की गई है जो केवल हवा के दबाव या जैविक ईंधनों से नहीं, बल्कि सौर ऊर्जा और पारे की वाष्प से संचालित होते थे। उन्होंने वायुमंडल के विभिन्न स्तरों ,।बादलों के प्रकार और विमानों के निर्माण में प्रयुक्त होने वाली विशिष्ट धातुओं की रासायनिक विधियों का विस्तृत उल्लेख किया है।.वैदिक और उत्तर-वैदिक काल में प्रयाग (आधुनिक प्रयागराज, उत्तर प्रदेश) के निकट उनका विशाल आश्रम था, जो एक तरह का विश्वविद्यालय था। यह भरत और प्रारंभिक कुरु वंश के साम्राज्यों का समय था।
महर्षि पाणिनी: भाषा विज्ञान और कंप्यूटर लॉजिक के सूत्रधार - खोज व वैज्ञानिक सिद्धांत: महर्षि पाणिनी ने संस्कृत व्याकरण का महान ग्रंथ 'अष्टाध्यायी' लिखा, जिसमें उन्होंने ३,९५९ नियम (सूत्र) बनाए। पाणिनी का यह कार्य केवल भाषा का व्याकरण नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से गणितीय तर्कशास्त्र (Mathematical Logic) और एल्गोरिद्म पर आधारित है। आधुनिक कंप्यूटर विज्ञानी (जैसे बैकस-नौर फॉर्म ) यह मानते हैं कि पाणिनी ने दुनिया की पहली 'फॉर्मल लैंग्वेज' की कोडिंग की थी। कंप्यूटर की प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेज (जैसे कंपाइलर डिजाइन) के विकास में पाणिनी के अष्टाध्यायी के नियमों का सीधा उपयोग होता है। लगभग ५वीं से ४थी शताब्दी ईसा पूर्व है। शालातुर (आधुनिक गांधार क्षेत्र, पाकिस्तान-अफ़गानिस्तान सीमा)। यह गांधार महाजनपद का क्षेत्र था, जो अपनी उच्च शिक्षा और तक्षशिला विश्वविद्यालय के लिए प्रसिद्ध था।
. महर्षि पतंजलि: मन और शरीर का अंतर्संबंध - खोज व वैज्ञानिक सिद्धांत: पतंजलि ने 'योग सूत्र' के माध्यम से मानव मन, अवचेतन चेतना और शरीर के अंतर्संबंधों को पूरी तरह से वैज्ञानिक रूप से संहिताबद्ध किया। उन्होंने 'अष्टांग योग' (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) का जो मार्ग दिया, वह आज के आधुनिक मनोविज्ञान और मनोदैहिक चिकित्सा के सिद्धांतों को पुष्ट करता है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने पाणिनी के व्याकरण पर 'महाभाष्य' लिखा और चिकित्सा के क्षेत्र में भी अमूल्य योगदान दिए है । दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व (लगभग १५० ईसा पूर्व) है। पाटलिपुत्र/मध्य भारत है । वे मौर्य वंश के पतन के बाद स्थापित हुए शुंग साम्राज्य के संस्थापक राजा पुष्यमित्र शुंग के समकालीन और उनके मुख्य पुरोहित थे।
प्राचीन भारत में विज्ञान का यह अभूतपूर्व विकास किसी एक सीमित क्षेत्र में नहीं हुआ, बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैला हुआ था। इसे हम तीन प्रमुख ज्ञान-केंद्रों के रूप में समझ सकते हैं:।उत्तर-पश्चिम क्षेत्र (गांधार, तक्षशिला, पंजाब) पाणिनी, चरक गांधार महाजनपद, कुषाण साम्राज्य कंप्यूटर लॉजिक (व्याकरण), आंतरिक चिकित्सा (आयुर्वेद) , गंगा घाटी व मध्य क्षेत्र (काशी, मगध, मिथिला) सुश्रुत, आर्यभट्ट, कणाद, याज्ञवल्क्य, पतंजलि काशी महाजनपद, विदेह साम्राज्य, गुप्त साम्राज्य, शुंग साम्राज्य प्लास्टिक सर्जरी, सूर्यकेंद्रित मॉडल, परमाणु सिद्धांत, गुरुत्वाकर्षण की नींव, योग विज्ञानपश्चिम व दक्षिण क्षेत्र (राजस्थान, महाराष्ट्र, आंध्र) ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य, नागार्जुन गुर्जर-प्रतिहार, पश्चिमी चालुक्य, सातवाहन साम्राज्य शून्य का नियम, गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत, रसायन विज्ञान व धातुकर्म है।
वैदिक विज्ञान की यह गहनता और ऋषियों की यह तार्किक मेधा हमें एक गंभीर आत्मनिरीक्षण की ओर ले जाती है। इतिहास के एक लंबे कालखंड में विदेशी आक्रमणों, पुस्तकालयों (जैसे नालंदा और तक्षशिला) के विध्वंस और औपनिवेशिक दासता के कारण भारत की यह वैज्ञानिक परंपरा मुख्यधारा से कट गई। इसका परिणाम यह हुआ कि: हमारी अपनी ही पीढ़ियों ने अपने मूल ग्रंथों—जैसे वैशेषिक सूत्र, आर्यभट्टियम् या सिद्धांत शिरोमणि—को पढ़ना छोड़ दिया। वे अपने प्रतीकों (जैसे शेषनाग) का वास्तविक तार्किक अर्थ भूल गए।
जब समाज अपनी वैज्ञानिक और दार्शनिक विरासत से कट जाता है, तो वह सतही कथाओं को ही अंतिम सत्य मान लेता है। इसी अज्ञानता का लाभ उठाकर कुछ लोग अपनी महान वैज्ञानिक विरासत का उपहास उड़ाते हैं या दूसरों के बहकावे में आकर अपनी जड़ों को छोड़ देते हैं। यह अपनी ही गौरवशाली थाती का अनजाने में किया गया तिरस्कार है।: सनातन संस्कृति का मूल आधार अंधविश्वास नहीं, बल्कि 'अथातो ब्रह्म जिज्ञासा' (सत्य को जानने की इच्छा) है। यहाँ ऋषियों ने प्रश्न पूछने, शास्त्रार्थ करने और प्रत्यक्ष प्रमाण को स्वीकार करने की पूरी स्वतंत्रता दी थी।
शेषनाग पर टिकी पृथ्वी की अवधारणा से लेकर कणाद के परमाणु और आर्यभट्ट के खगोलशास्त्र तक—भारत का प्राचीन ज्ञान-विज्ञान पूरी तरह प्रामाणिक, गणितीय और तार्किक है। वाराह मिहिर, नागार्जुन, अगस्त्य, कश्यप, भृगु, अत्रि, वत्स, लोमश और कण्व जैसे अनगिनत ऋषियों ने जो ज्ञान संसार को दिया, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यह हमारी पीढ़ी की परम जिम्मेदारी है कि हम अंधविश्वास और संकीर्णता दोनों से ऊपर उठें। हमें अपने मूल ग्रंथों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temperament) के साथ तार्किक अध्ययन करना चाहिए, अपनी इस अद्वितीय वैज्ञानिक विरासत को विश्व पटल पर गर्व के साथ स्थापित करना चाहिए और पूरी प्रामाणिकता के साथ इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना चाहिए ताकि भविष्य का भारत अपनी जड़ों से जुड़कर एक बार फिर 'विश्वगुरु' के रूप में उभर सके।


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