भरी सभा में अनोखी चुनौती
लेखक: आनन्द हठीला
उसी दौर में, वहां के एक रसूखदार और घमंडी जमींदार (कुछ कथाओं में एक बड़े राजा या जागीरदार के सिपाही) को संत दरियाव जी की यह बढ़ती लोकप्रियता पसंद नहीं आई। उसे लगा कि एक साधारण सा संत पूरे इलाके में इतना पूजनीय कैसे हो सकता है। वह संत जी की परीक्षा लेने और उन्हें नीचा दिखाने का मौका ढूंढने लगा।
भरी सभा में अनोखी चुनौती
एक दिन, वह जमींदार अपने कई साथियों और गांव के लोगों के साथ संत दरियाव जी की कुटिया पर पहुंचा। उस समय संत जी ध्यान में लीन थे।
जमींदार ने रौब जमाते हुए कहा, *"बाबा! सुना है आपकी भक्ति में बड़ी शक्ति है। लोग कहते हैं कि आपके आशीर्वाद से यहां मीठा पानी निकल आया। लेकिन हम तो तब मानें, जब आप अपनी भक्ति का कोई साक्षात प्रमाण दें!"
संत दरियाव जी ने अपनी शांत आंखें खोलीं और बड़ी विनम्रता से कहा, *"भाई, मैं तो एक साधारण राम-भक्त हूँ। मेरे पास कोई शक्ति या जादू नहीं है। सब राम जी की माया है।"
जमींदार ने हंसते हुए पास ही पड़े मकान निर्माण के काम को देखा, जहाँ लाल पक्की ईंटें रखी थीं। उसने एक भारी ईंट उठाई और कहा, *"अगर तुम्हारे राम में सच में दम है, तो इस भारी ईंट को पानी पर तैरा कर दिखाओ। अगर यह ईंट तैर गई, तो मैं तुम्हारी भक्ति को स्वीकार कर लूंगा, नहीं तो तुम्हें यह ढोंग बंद करके यहां से जाना होगा।"*
'राम' नाम का पत्थर और तैरती ईंट
गांव वाले डर गए। सब जानते थे कि ईंट पानी में डालते ही डूब जाएगी। यह तो प्रकृति का नियम है। लेकिन संत दरियाव जी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, *"ईंट भारी है, यह तो डूबेगी ही। लेकिन अगर मेरे राम जी चाहें, तो पत्थर भी तैर सकते हैं।"*
संत जी खड़े हुए और उस भारी ईंट को अपने हाथ में लिया। उन्होंने अपनी आंखें बंद कीं और पूरी श्रद्धा से उस ईंट पर उंगली से **'राम'** नाम लिख दिया।
इसके बाद, वे गांव की उसी बावड़ी (दरियाव बावड़ी) के पास गए। पूरा गांव सांस रोककर देख रहा था। जमींदार के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी।
संत दरियाव जी ने 'जय श्री राम' का जयकारा लगाया और उस भारी ईंट को पानी में छोड़ दिया।
और फिर एक अजूबा हुआ!
जैसे ही ईंट पानी में गिरी, वह नीचे डूबने के बजाय, किसी लकड़ी के टुकड़े की तरह पानी की सतह पर तैरने लगी! हवा के झोंकों के साथ वह ईंट पानी पर इधर-उधर डोल रही थी, लेकिन डूब नहीं रही थी। यह ठीक वैसा ही दृश्य था, जैसे त्रेतायुग में श्रीराम की सेना ने समुद्र पर पत्थर तैराए थे।
अहंकार का अंत
यह चमत्कार देखकर वहां मौजूद सभी ग्रामीणों की आंखों में आंसू आ गए और पूरा इलाका 'संत दरियाव जी की जय' और 'राम-राम' के जयकारों से गूंज उठा।
जमींदार का घमंड एक पल में चूर-चूर हो गया। वह संत जी के चरणों में गिर पड़ा और अपनी धृष्टता के लिए क्षमा मांगने लगा। संत जी ने उसे उठाकर गले लगाया और कहा, *"यह मेरा कोई चमत्कार नहीं है, यह सिर्फ 'राम' नाम की महिमा है। नाम में वो शक्ति है जो डूबते को भी तार देती है।"*
आज भी मौजूद है वो प्रतीकरेण गांव के रामद्वारे और इतिहास में इस घटना का बहुत महत्व है। यह कहानी सिखाती है कि जब इंसान का विश्वास पक्का होता है, तो प्रकृति भी अपना नियम बदल देती है।
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