जगतपिता ब्रह्मदेव धर्मशाला एवं गुरुकुल-छात्रावास में नवप्रवेशित छात्रों का यज्ञोपवीत संस्कार एवं वैदिक अनुष्ठान सम्पन्न

- वैदिक मंत्रोच्चार, रुद्राभिषेक, हवन एवं पूजन-अर्चन के बीच संस्कारमय वातावरण में हुआ आयोजन, विद्यार्थियों को मिला सनातन संस्कृति के संरक्षण का संदेश
पटना। भारतीय वैदिक परंपरा, संस्कारमय शिक्षा तथा सनातन सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से जगतपिता ब्रह्मदेव धर्मशाला एवं गुरुकुल-छात्रावास में नवप्रवेशित छात्रों का यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कार अत्यंत श्रद्धा, भक्ति एवं वैदिक विधि-विधान के साथ सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर आयोजित विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठानों ने सम्पूर्ण परिसर को आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्तिमय वातावरण से आलोकित कर दिया।
कार्यक्रम का शुभारम्भ वैदिक आचार्यों एवं विद्वान ब्राह्मणों द्वारा मंगलाचरण, गणेश वंदना तथा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हुआ। इसके पश्चात नवप्रवेशित छात्रों का यज्ञोपवीत संस्कार वैदिक परंपरानुसार सम्पन्न कराया गया। संस्कार के दौरान विद्यार्थियों को वेदाध्ययन, गुरु-सेवा, संयम, अनुशासन तथा सदाचारपूर्ण जीवन जीने का संकल्प दिलाया गया। आचार्यों ने उपनयन संस्कार के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ज्ञान, कर्तव्य और आत्मिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होने का प्रथम संस्कार है।
इस पावन अवसर पर धर्मशाला के निर्माणकर्ता एवं मुख्य न्यासी पंडित जुगुल किशोर तिवारी एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सुधा तिवारी ने भगवान शिव का विधिवत रुद्राभिषेक तथा भगवान परशुराम का विशेष पूजन-अर्चन किया। उन्होंने राष्ट्र की समृद्धि, समाज के कल्याण, विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य तथा सनातन धर्म एवं संस्कृति की अक्षुण्ण रक्षा हेतु प्रार्थना की। रुद्राभिषेक के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा "हर-हर महादेव" एवं वैदिक मंत्रों के उद्घोष से सम्पूर्ण वातावरण शिवमय हो उठा।
यज्ञोपवीत संस्कार के उपरांत पंडित जुगुल किशोर तिवारी ने उपस्थित विद्यार्थियों, अभिभावकों एवं अतिथियों को संबोधित करते हुए कहा कि गुरुकुल शिक्षा भारत की प्राचीनतम एवं सर्वश्रेष्ठ शिक्षा परंपरा है, जिसने विश्व को ज्ञान, विज्ञान, दर्शन और संस्कृति का मार्ग दिखाया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में चरित्र निर्माण और नैतिक मूल्यों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। गुरुकुल व्यवस्था विद्यार्थियों को केवल शैक्षणिक ज्ञान ही नहीं देती, बल्कि उन्हें अनुशासित, संस्कारित, राष्ट्रनिष्ठ और समाजोपयोगी नागरिक भी बनाती है।
श्रीमती सुधा तिवारी ने विद्यार्थियों को मातृवत स्नेह एवं आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा कि जीवन में सफलता का आधार केवल शिक्षा नहीं, बल्कि संस्कार, विनम्रता, सेवा-भाव और आत्मसंयम भी हैं। उन्होंने नवप्रवेशित छात्रों से गुरुजनों के प्रति सम्मान, माता-पिता के प्रति श्रद्धा तथा समाज एवं राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने का आग्रह किया।
कार्यक्रम के दौरान वैदिक हवन, आहुतियाँ, रुद्रपाठ, देव पूजन एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न हुए। यज्ञ की पवित्र अग्नि में राष्ट्रकल्याण, विश्वशांति, पर्यावरण संरक्षण तथा मानवता के मंगल की कामना से आहुतियाँ समर्पित की गईं। वैदिक ऋचाओं एवं मंत्रोच्चार से वातावरण आध्यात्मिक चेतना से परिपूर्ण हो उठा।
समारोह में उपस्थित अभिभावकों एवं श्रद्धालुओं ने गुरुकुल की व्यवस्थाओं, संस्कारप्रधान शिक्षा पद्धति तथा धार्मिक गतिविधियों की सराहना करते हुए कहा कि आधुनिक समय में ऐसे संस्थान भारतीय संस्कृति एवं नैतिक मूल्यों को जीवित रखने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। उन्होंने गुरुकुल की निरंतर प्रगति तथा विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए शुभकामनाएँ व्यक्त कीं।
कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों, अभिभावकों एवं विद्यार्थियों को प्रसाद वितरण किया गया। आयोजकों ने बताया कि गुरुकुल में विद्यार्थियों को वैदिक अध्ययन के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा, नैतिक प्रशिक्षण, योग, आध्यात्मिक साधना तथा भारतीय संस्कृति के विभिन्न आयामों का भी प्रशिक्षण दिया जाता है, जिससे वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकें।यह आयोजन भारतीय वैदिक परंपरा, संस्कारमय शिक्षा, राष्ट्रनिर्माण और सांस्कृतिक जागरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं प्रेरणादायी पहल के रूप में स्मरणीय रहा। उपस्थित सभी लोगों ने इसे सनातन संस्कृति के संरक्षण और भावी पीढ़ी के चरित्र निर्माण की दिशा में एक सार्थक प्रयास बताया।
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