IAS कब जवाबदेह होंगे?
- लोकतंत्र में सत्ता के अदृश्य केंद्र और जनता का प्रश्न
डॉ. राकेश दत्त मिश्र
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है, सरकारें बनाती है और समय आने पर उन्हें सत्ता से बाहर भी कर देती है। लोकतंत्र का यह सबसे बड़ा गुण है कि अंतिम शक्ति जनता के हाथों में होती है। लेकिन क्या वास्तव में शासन व्यवस्था के सभी स्तंभ जनता के प्रति समान रूप से जवाबदेह हैं? क्या हर वह व्यक्ति, जिसके निर्णय करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, जनता के प्रश्नों का सामना करता है?
यह प्रश्न आज इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि देश में जब भी कोई बड़ा प्रशासनिक विवाद, परीक्षा घोटाला, भर्ती घोटाला, योजनागत भ्रष्टाचार या नीतिगत विफलता सामने आती है, तो सार्वजनिक विमर्श मुख्य रूप से नेताओं और मंत्रियों के इर्द-गिर्द सिमट जाता है। मीडिया की बहसें राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह जाती हैं। लेकिन प्रशासनिक तंत्र के शीर्ष पर बैठे वे अधिकारी, जिनके हस्ताक्षर के बिना कोई फाइल आगे नहीं बढ़ती, जिनकी सलाह पर नीतियां बनती हैं और जिनकी निगरानी में योजनाएं लागू होती हैं, वे अक्सर चर्चा और जवाबदेही के दायरे से बाहर दिखाई देते हैं।
यही कारण है कि आज एक नया प्रश्न जन्म ले रहा है—क्या भारतीय लोकतंत्र में नौकरशाही, विशेषकर आईएएस अधिकारियों की जवाबदेही पर गंभीर चर्चा का समय आ गया है?
सत्ता के दो चेहरे
भारतीय शासन व्यवस्था को यदि ध्यान से देखा जाए तो इसके दो चेहरे दिखाई देते हैं।
पहला चेहरा राजनीतिक है। मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद और विधायक जनता के सामने होते हैं। उनके भाषण, निर्णय और गतिविधियां सार्वजनिक होती हैं। जनता उन्हें देखती है, सुनती है और चुनावों में उनके कार्यों का मूल्यांकन करती है।
दूसरा चेहरा प्रशासनिक है। यह वह स्थायी तंत्र है जिसे हम नौकरशाही कहते हैं। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन प्रशासनिक ढांचा बना रहता है। एक मंत्री पांच वर्ष बाद बदल सकता है, लेकिन एक आईएएस अधिकारी तीन से चार दशक तक शासन व्यवस्था का हिस्सा बना रहता है।
यहीं एक महत्वपूर्ण अंतर पैदा होता है। मंत्री जनता के प्रति प्रत्यक्ष रूप से जवाबदेह है, जबकि नौकरशाह मुख्यतः सेवा नियमों और विभागीय प्रक्रियाओं के प्रति जवाबदेह होता है। परिणामस्वरूप जब कोई बड़ी विफलता सामने आती है तो राजनीतिक नेतृत्व तो जनता के कटघरे में खड़ा होता है, लेकिन प्रशासनिक नेतृत्व अक्सर पर्दे के पीछे ही रहता है।
क्या केवल नेता ही जिम्मेदार हैं?
जब किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है, किसी भर्ती प्रक्रिया में धांधली होती है, किसी सरकारी योजना में अरबों रुपये का घोटाला सामने आता है, किसी पुल का निर्माण भ्रष्टाचार के कारण ढह जाता है या किसी विभाग में व्यापक अनियमितता पाई जाती है, तो पहला प्रश्न होता है-सरकार क्या कर रही थी?
यह प्रश्न उचित है, लेकिन इसके साथ एक दूसरा प्रश्न भी होना चाहिए-वह प्रशासनिक तंत्र क्या कर रहा था जिसकी जिम्मेदारी इन व्यवस्थाओं को संचालित करने की थी?
कोई भी मंत्री प्रतिदिन हजारों फाइलें नहीं पढ़ सकता। वह प्रत्येक प्रक्रिया की निगरानी नहीं कर सकता। वास्तविक प्रशासनिक संचालन विभागीय सचिवों, आयुक्तों, निदेशकों और अन्य अधिकारियों के माध्यम से होता है। ऐसे में यदि कोई गंभीर विफलता होती है तो उसकी जिम्मेदारी केवल राजनीतिक नेतृत्व तक सीमित नहीं हो सकती।
नीट और सीबीएसई जैसे विवादों से उठे प्रश्न
हाल के वर्षों में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े अनेक विवादों ने देश को झकझोर दिया। लाखों विद्यार्थियों और उनके परिवारों का भविष्य दांव पर लग गया। प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा प्रबंधन की खामियां, मूल्यांकन विवाद और पारदर्शिता को लेकर उठे प्रश्नों ने पूरे तंत्र पर सवाल खड़े किए।
इन संस्थाओं का संचालन किसी एक मंत्री के कार्यालय से नहीं होता। इनके पीछे एक विशाल प्रशासनिक ढांचा होता है। निर्णय लेने, निगरानी करने और प्रक्रियाओं को लागू करने में वरिष्ठ अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
फिर भी जब विवाद सामने आते हैं तो सार्वजनिक चर्चा में नौकरशाही की भूमिका अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। इससे जनता के मन में यह धारणा बनती है कि व्यवस्था में जवाबदेही का बोझ समान रूप से वितरित नहीं है।
नौकरशाही की शक्ति और प्रभाव
भारत में आईएएस अधिकारी केवल फाइलों पर हस्ताक्षर करने वाले कर्मचारी नहीं हैं। वे जिलों का प्रशासन चलाते हैं, राज्य और केंद्र सरकार के विभागों का नेतृत्व करते हैं, नीतियों के निर्माण में योगदान देते हैं और अरबों रुपये के बजट के उपयोग की निगरानी करते हैं।
एक जिला अधिकारी का निर्णय लाखों लोगों को प्रभावित कर सकता है। एक सचिव का निर्णय पूरे राज्य या देश की नीति की दिशा बदल सकता है। इतनी व्यापक शक्ति के साथ उतनी ही व्यापक जवाबदेही भी अपेक्षित होनी चाहिए।
लोकतंत्र में शक्ति और जवाबदेही एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि शक्ति बढ़ती है लेकिन जवाबदेही नहीं बढ़ती, तो असंतुलन पैदा होना स्वाभाविक है।
जनता सीधे सवाल क्यों नहीं पूछ सकती?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है और चुनाव के माध्यम से उन्हें दंडित या पुरस्कृत करती है। लेकिन आईएएस अधिकारी चुनाव नहीं लड़ते। वे प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से सेवा में आते हैं और संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत कार्य करते हैं।
इस व्यवस्था के अपने लाभ हैं। इससे प्रशासनिक निरंतरता बनी रहती है और शासन केवल राजनीतिक बदलावों पर निर्भर नहीं रहता। लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है। जनता के पास प्रशासनिक अधिकारियों को सीधे जवाबदेह बनाने का कोई प्रभावी लोकतांत्रिक साधन नहीं होता।
यही कारण है कि जब कोई प्रशासनिक विफलता होती है तो जनता के भीतर असंतोष बढ़ता है।
क्या सभी आईएएस अधिकारी दोषी हैं?
इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट रूप से "नहीं" है।
देश में अनेक आईएएस अधिकारी ऐसे हैं जिन्होंने अपनी ईमानदारी, कार्यकुशलता और जनसेवा के माध्यम से मिसाल कायम की है। अनेक जिलों में शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, जल संरक्षण और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य हुए हैं। कई अधिकारियों ने व्यक्तिगत जोखिम उठाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी है।
इसलिए यह बहस किसी व्यक्ति विशेष या पूरी सेवा को कटघरे में खड़ा करने की नहीं है। यह बहस उस प्रणाली की है जिसमें सफलता का श्रेय ऊपर तक पहुंच जाता है, लेकिन विफलता की जिम्मेदारी अक्सर नीचे के स्तर पर रोक दी जाती है।
जवाबदेही की नई परिभाषा
आज भारत एक नए युग में प्रवेश कर चुका है। डिजिटल तकनीक, सूचना का अधिकार, सोशल मीडिया और बढ़ती जनजागरूकता ने नागरिकों को अधिक सजग बनाया है। जनता केवल यह नहीं जानना चाहती कि निर्णय क्या लिया गया; वह यह भी जानना चाहती है कि निर्णय किसने लिया, किस आधार पर लिया और उसके परिणामों की जिम्मेदारी कौन लेगा।
लोकतंत्र में जवाबदेही केवल चुनाव जीतने या हारने का विषय नहीं है। यह एक सतत प्रक्रिया है जिसमें सत्ता के हर केंद्र को जनता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए।
क्या सुधार संभव हैं?
निश्चित रूप से।
यदि राजनीतिक नेतृत्व की तरह प्रशासनिक नेतृत्व के लिए भी पारदर्शी प्रदर्शन मूल्यांकन की व्यवस्था हो, यदि बड़ी प्रशासनिक विफलताओं की स्वतंत्र जांच अनिवार्य हो, यदि महत्वपूर्ण निर्णयों की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से दर्ज की जाए और यदि संसदीय तथा विधायी समितियों को अधिक प्रभावी बनाया जाए, तो जवाबदेही की संस्कृति मजबूत हो सकती है।
साथ ही यह भी आवश्यक है कि ईमानदार और सक्षम अधिकारियों को संरक्षण मिले तथा दोषी अधिकारियों के विरुद्ध समयबद्ध कार्रवाई हो। जवाबदेही का अर्थ केवल दंड नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व की स्पष्ट व्यवस्था है।
लोकतंत्र का अधूरा प्रश्न
आज भारत का नागरिक यह पूछ रहा है कि यदि किसी मंत्री से जवाब मांगा जा सकता है, किसी सांसद से जवाब मांगा जा सकता है, किसी मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री से जवाब मांगा जा सकता है, तो उन अधिकारियों से जवाब क्यों नहीं मांगा जाना चाहिए जिनके निर्णय प्रतिदिन करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं?
यह प्रश्न किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पूर्णता के पक्ष में है।
लोकतंत्र तब परिपक्व होता है जब सत्ता का कोई भी केंद्र जनता के प्रश्नों से ऊपर न हो। चाहे वह राजनीतिक सत्ता हो या प्रशासनिक सत्ता, दोनों को समान रूप से जवाबदेह होना चाहिए।
जिस दिन भारत की शासन व्यवस्था में शक्ति और जवाबदेही का संतुलन पूरी तरह स्थापित हो जाएगा, उस दिन जनता को यह महसूस होगा कि लोकतंत्र केवल मतपेटी तक सीमित नहीं है, बल्कि शासन के प्रत्येक स्तर पर उसकी आवाज सुनी और सम्मानित की जाती है।
प्रश्न केवल इतना नहीं है कि "आईएएस कब जवाबदेह होंगे?" बल्कि इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि "लोकतंत्र में जवाबदेही का दायरा आखिर कहां तक जाएगा?"
और शायद आने वाले वर्षों में यही प्रश्न भारतीय लोकतंत्र की दिशा निर्धारित करेगा।
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