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निराला निकेतन में महावाणी स्मरण सह काव्य गोष्ठी एवं पौधारोपण कार्यक्रम संपन्न

निराला निकेतन में महावाणी स्मरण सह काव्य गोष्ठी एवं पौधारोपण कार्यक्रम संपन्न

पटना, 5 जून। साहित्य, संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का अद्भुत संगम उस समय देखने को मिला जब निराला निकेतन में आचार्य श्री जानकी वल्लभ शास्त्री की प्रतिमा स्थल पर "महावाणी स्मरण सह काव्य गोष्ठी" का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. उषा किरण श्रीवास्तव ने की, जबकि संचालन प्रसिद्ध कवयित्री डॉ. संगीता सागर ने किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्य श्री जानकी वल्लभ शास्त्री की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर तथा उनकी साहित्यिक साधना को स्मरण करते हुए किया गया। उपस्थित साहित्यकारों ने उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शास्त्री जी का साहित्य आज भी नई पीढ़ी को मानवीय मूल्यों, संवेदनाओं और सृजनशीलता की प्रेरणा प्रदान करता है।

काव्य गोष्ठी में विभिन्न कवियों एवं साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ कर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरि किशोर प्रसाद सिंह ने अपनी रचना "बीतल पुरना, वरीस नया सुरूज उगल" के माध्यम से लोकजीवन और नवचेतना का संदेश दिया। अंजनी कुमार पाठक ने "ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाओ" कविता के जरिए पर्यावरण संरक्षण का आह्वान किया और वृक्षों के महत्व को रेखांकित किया।

कवि अरुण कुमार तुलसी ने "सुहाने जिंदगी की रंगभरी शाम" का भावपूर्ण पाठ कर जीवन के विविध रंगों को प्रस्तुत किया। प्रमोद नारायण मिश्र ने "दिल रोता है मैं हंसता हूं" कविता के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं और अंतर्द्वंद्व को अभिव्यक्त किया। वहीं सत्येन्द्र कुमार 'सत्येन' ने अपनी लोकधर्मी रचना "पिया जब दुल्हा बनी दुअरिया" का पाठ कर श्रोताओं को लोक संस्कृति की मिठास से सराबोर कर दिया।

कार्यक्रम में डॉ. संगीता सागर ने "मेरे गांव में था एक इमली का पेड़" कविता का पाठ करते हुए गांव की स्मृतियों, प्रकृति और बचपन की भावनाओं को जीवंत कर दिया। अध्यक्षीय उद्बोधन से पूर्व डॉ. उषा किरण श्रीवास्तव ने अपनी कविता "अपनी फुलवारी में मैंने तरह-तरह के फूल लगाए" का पाठ किया, जिसमें जीवन, प्रेम, सौंदर्य और मानवीय संबंधों की सुगंध समाहित थी। कवि अशोक भारती ने "धूप पर जब भी लिखोगे बात चांदनी की होगी" कविता के माध्यम से जीवन के उजाले और आशा का संदेश दिया।

इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण होने के साथ-साथ सामाजिक चेतना का वाहक भी है। कविताएं केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने और संवेदनशील बनाने का सशक्त साधन हैं।

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर कार्यक्रम के दूसरे चरण में डॉ. उषा किरण श्रीवास्तव के नेतृत्व में पौधारोपण अभियान चलाया गया। साहित्यकारों एवं उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों ने निराला निकेतन परिसर में पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया। इस अवसर पर डॉ. उषा किरण श्रीवास्तव ने कहा कि वृक्ष केवल प्रकृति की शोभा नहीं बढ़ाते, बल्कि मानव जीवन के अस्तित्व का आधार हैं। वर्तमान समय में बढ़ते पर्यावरणीय संकट को देखते हुए प्रत्येक नागरिक को अधिक से अधिक वृक्ष लगाने और उनकी देखभाल करने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

कार्यक्रम के अंत में डॉ. संगीता सागर ने सभी अतिथियों, कवियों एवं उपस्थित श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने कहा कि साहित्य और पर्यावरण दोनों ही मानव सभ्यता की अमूल्य धरोहर हैं तथा इनके संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।महावाणी स्मरण, काव्य पाठ और पौधारोपण जैसे रचनात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से निराला निकेतन ने एक बार फिर साहित्यिक चेतना और पर्यावरणीय जिम्मेदारी का संदेश समाज तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्र, समाज और प्रकृति के कल्याण की मंगलकामनाओं के साथ हुआ।
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