प्रकृति के रक्षक: समझदारी का पाठ
सत्येन्द्र कुमार पाठक
गर्मियों की छुट्टियाँ खत्म हो चुकी थीं। आज पाँच जून यानी विश्व पर्यावरण दिवस का दिन था। सुबह की सुहानी धूप खिली थी। इसी विशेष दिन दिव्यांशु, प्रियांशु और पीहू ने चौथी कक्षा में कदम रखा था। ये तीनों पक्के दोस्त थे, जिन्हें स्कूल में 'पढ़ाकू ग्रुप' कहा जाता था। जैसे ही वे अपनी कक्षा में पहुँचे, वहाँ का माहौल बदला हुआ था। दीवारों पर जंगलों और नदियों के सुंदर पोस्टर लगे थे। उनकी प्रिय सुहानी शिक्षिका ने मुस्कुराते हुए कहा, "बच्चों! आज हम किताबों से नहीं, बल्कि उस किताब को पढ़ेंगे जिसे भगवान ने खुद लिखा है—हमारी प्रकृति! यदि पेड़-पौधे और नदियाँ सुरक्षित हैं, तभी हमारा अस्तित्व है।" पास खड़े दूसरे शिक्षक ने भी समझाया कि कैसे इंसान स्वार्थ में पेड़ काट रहा है और नदियों को प्रदूषित कर रहा है। शिक्षकों की इन बातों ने बच्चों के कोमल मनों पर गहरा असर किया। लंच की घंटी बजते ही तीनों दोस्त नीम के पेड़ के नीचे इकट्ठा हुए। उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थामकर कसम खाई कि वे केवल कक्षा में प्रथम आने के लिए नहीं, बल्कि धरती माँ को बचाने के लिए भी काम करेंगे।
स्कूल के बाद तीनों दोस्त प्रियांशु के घर गए। वहाँ बरामदे में प्रियांशु के ज्ञानी दादा जी बैठे थे। बच्चों ने उनसे पर्यावरण के बारे में और जानने की इच्छा जताई। तभी प्रियांशु के माता-पिता भी वहाँ नींबू-पानी लेकर आ गए।
दादा जी ने प्यार से समझाया, "बच्चों, नदियाँ इस धरती की नसें हैं जिनमें जल रूपी रक्त बहता है। और ये पेड़-पौधे धरती के फेफड़े हैं, जो हमारी छोड़ी ज़हरीली हवा को पीकर हमें शुद्ध ऑक्सीजन देते हैं।" पापा ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, "इसीलिए हमारे पूर्वज पीपल, नीम और तुलसी की पूजा करते थे।" मम्मी ने भी पानी की बर्बादी रोकने और वर्षा जल संचयन पर ज़ोर दिया। अब बच्चों को किताबी ज्ञान से परे व्यावहारिक समझ मिल चुकी थी। उन्होंने हर रविवार लोगों को जागरूक करने का फैसला किया।
एक दिन स्कूल से लौटते समय, रास्ते के एक सुनसान मोड़ पर कॉलेज के कुछ हुड़दंगी लड़कों ने मोटरसाइकिलें आड़ी खड़ी करके बच्चों का रास्ता रोक लिया। वे लड़कियां (दिव्यांशु और पीहू) पर फब्तियाँ कसने लगे। उस दिन तो प्रियांशु उन्हें बुद्धिमानी से पतली गली से निकाल लाया, लेकिन वे सब डरे हुए थे।
शाम को उनकी चतुर सहेली सुहानी भी उनसे मिली। पूरी बात सुनकर सुहानी मुस्कुराई और बोली, "लोहे को लोहा काटता है। मेरे पास एक तरकीब है!" उसने सबके कान में एक मजेदार योजना फुसफुसाई। अगले दिन, जैसे ही वे उसी मोड़ पर पहुँचे, लड़कों के सरदार ने फिल्मी अंदाज़ में कहा, "अगर मुझसे दोस्ती नहीं की, तो मैं इसी बरगद से लटककर जान दे दूँगा। मेरे पास महलों की सुख-सुविधाएँ हैं।"
योजना के अनुसार, सुहानी ने चेहरे पर झूठी लाचारी लाते हुए कहा, "भैया, महल में राज करना किसे बुरा लगता है? पर एक बहुत बड़ी समस्या है। हम सब जानलेवा बीमारियों से ग्रसित हैं।"
लड़के चौंक गए। दिव्यांशु ने गहरी सिसकी भरते हुए कहा, "हाँ भैया! हमारे फेफड़ों में प्रदूषण का 'कैंसर' है। प्रियांशु की दोनों किडनियाँ गंदा पानी पीने से खराब हो चुकी हैं और पीहू को साँस की भयंकर बीमारी है। डॉक्टर ने कहा है कि अगर हमें बचना है, तो हमें एक ऐसा महल चाहिए जहाँ चौबीसों घंटे शुद्ध ऑक्सीजन देने वाले 500 पेड़ हों और पीने के लिए साफ पहाड़ी झरना हो। क्या आप हमारा इलाज कराएँगे?"
प्रदूषण को गंभीर शारीरिक बीमारी के रूप में सुनकर लड़कों के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। लाखों के खर्चे और अस्पतालों के डर से घबराकर, लड़कों ने तुरंत अपनी बाइक स्टार्ट की और नौ दो ग्यारह हो गए। बच्चों की दिमागी ताकत ने बिना किसी लड़ाई-झगड़े के हुड़दंगियों को भगा दिया था।
इस सफलता से बच्चों का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने सोचा कि जब एक झूठी बीमारी से लड़के भाग सकते हैं, तो क्यों न वे सचमुच धरती की बीमारी (प्रदूषण) को दूर करें। सुहानी शिक्षिका की मदद से स्कूल में "बाल प्रकृति रक्षक सेना" का गठन किया गया, जिसकी सेनापति दिव्यांशु बनी। अब हर छुट्टी के दिन यह टोली नुक्कड़ नाटक करती। नाटक में सुहानी 'धरती माँ' बनकर बताती कि कैसे कचरा और प्लास्टिक नदियों की किडनी जाम कर रहे हैं। बच्चों का यह अंदाज़ लोगों के दिलों को छू गया। लोग सड़कों पर कचरा फेंकने के बजाय पौधे लगाने लगे। बच्चों की इस मुहिम की गूंज राज्य के मुख्यमंत्री तक पहुँची। अगले वर्ष, विश्व पर्यावरण दिवस पर उन्हें भव्य समारोह में "राष्ट्रीय बाल पर्यावरण गौरव पुरस्कार" से सम्मानित किया गया।
सीख - सूझबूझ सबसे बड़ा हथियार है: कठिन परिस्थितियों में घबराने के बजाय ठंडे दिमाग से योजना बनाकर बड़े से बड़े शत्रु को परास्त किया जा सकता है। पर्यावरण की रक्षा हमारा दायित्व है: प्रकृति को प्रदूषित करना अप्रत्यक्ष रूप से बीमारियों को आमंत्रण देना है। धरती को हरा-भरा रखना ही सच्चे नागरिक का कर्तव्य है।
करपी , अरवल , बिहार 804419
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